3. प्रांतीय विधायिका - Page 92

प्रांतीय विधायिका

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सकते हैं। यदि दोनों सदनों के अधिकार बराबर होंगे, तो गतिरोध होंगे ही और सभी गतिरोधों का अनिवार्य परिणाम होता है, दुखद समझौता भले ही वह विवादग्रस्त सिद्ध ान्त की सम्पूर्ण तिलांजलि न हो। दूसरी ओर, यदि दूसरे सदन के अधिकार कुछ कम होंगे, तो वह पहले सदन के हड़बड़ी में किए गए कार्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाएगा और इस तरह अपने उद्देश्य में विफल रहेगा।

  1. दूसरे सदन की रचना की रूपरेखा निश्चित करते समय मेरे साथियों ने इन सब कठिनाइयों की उपेक्षा की है। उन्होंने ऐसा दूसरा सदन खड़ा किया है, जो अवगुणों का भंडार होगा और उसमें कोई गुण होंगे ही नहीं। ऐसा लगता है कि दूसरे सदन के गठन का समर्थन करने वाले लोग कमोवेश भीड़ की मनोवृत्ति से प्रभावित हैं। ऐतिहासिक कालों में दूसरे सदन के बड़े पैमाने पर गठन से राजनीतिक शास्त्र में एक सिद्धान्त पनपा कि दूसरा सदन निर्वाचित सरकार का आवश्यक अंग होता है। परन्तु यह बात भुला दी जाती है कि इंग्लैंड में जिस द्विसदन प्रणाली का जन्म हुआ, वह एक विशुद्ध ऐतिहासिक संयोग था। दूसरे देशों में इसे स्थान इसलिए मिल गया था कि अविकसित देशों ने विकसित देशों की नकल की। उसके साथ यह गुण जोड़ दिया गया कि वह निर्वाचित सदन द्वारा हड़बड़ी में किए गए कार्यों पर अंकुश रखेगा। यह बाद की ईजाद है कि जिसे मानव - मन ने सर्वमान्य तथ्य को बनाए रखने के लिए खोज लिया। परन्तु यह ध्यान में रखा ही जाए कि काफी अर्से से दूसरे सदन के प्रति यह विश्वास दिनोंदिन क्षीण पड़ता जा रहा है और युद्ध पूर्व के कनाडा और दक्षिण अफ्रीका के संविधानों में तथा युद्धोपरांत के कई अन्य संविधानों जैसे लातविया, लिथुआनिया एसथोनिया और यूगोस्लाविया के संविधान में दूसरे सदन समाप्त कर दिए गए। यह प्रतिक्रिया इस पनपती हुई धारणा का फल है कि किसी सरकार का मूल्यांकन उसके प्रतिसाम्य के आधार पर नहीं, बल्कि समग्र रूप से उसकी उपलब्धियों तथा वास्तविक जनसेवा और राष्ट्रीय कल्याण के अनुसार किया जाना चाहिए।

  2. दूसरे सदन के गठन के संबंध में उपयोगिता की दृष्टि से भी मैं यह स्वीकार नहीं कर सकता कि यह एक संशोधी सदन के रूप में कार्य कर सकता है। यदि संशोधन का अर्थ है मतदाताओं की व्याख्या करना, तो मेरी समझ में नहीं आता कि दूसरे सदन से कैसे यह आशा की जाती है कि मतदाताओं की इच्छा के बारे में उसका निर्णय पहले सदन के निर्णय से अधिक सही होगा। मैं सोचता हूँ कि जब इस प्रकार का प्रश्न उठे, तो उसके बारे में सर्वोत्तम निर्णायक मतदाता होगा, दूसरा सदन नहीं, जब तक कि हम यह न मान लें कि अपनी स्थिति के कारण दूसरे सदन के सदस्यों का व्यक्तित्व निचले सदन के सदस्यों से ऊंचा है। मैं इस बात से सहमत नहीं कि दूसरे सदन में ऐसे कोई गुण हैं। वास्तव में दूसरा सदन भी लोकेच्छा को ठीक - ठीक समझने में उतना ही विफल होगा, जितना पहला सदन और हो सकता है कि इस मामले में उसके निजी हित उसे ऐसा डांवाडोल पूर्वाग्रह प्रदान करें कि वह स्वतंत्र