3. प्रांतीय विधायिका - Page 93

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

और तर्कसम्मत निर्णय ले ही न सके। इसलिए यह बेहतर तथा अधिक सुरक्षित और अधिक तर्कसंगत होगा कि एक ही सदन रखा जाए और जब कोई संदेह हो तो निर्णय का दायित्व मतदाताओं को सौंप दिया जाए, जो सदन को चुनते हैं। दूसरे सदन को यदि इसलिए महत्व दिया जाता है कि पहले सदन के फैसलों को लटका दिया जाए, तो गवर्नर के पास वह अधिकार तो है ही। उसे यह अधिकार है कि विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक विशेष को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दे। यदि विधायिका इस पर पुनर्विचार न करके उसे ज्यों का त्यों पास कर दे, तो भी गवर्नर उसे वीटो द्वारा रोक सकता है। यदि विधायिका गवर्नर के इस फैसले को भी न माने, तो वह गवर्नर को सदन के विघटन के लिए विवश करके मांग कर सकती है कि विवादग्रस्त मामले पर मतदाताओं की राय ले ली जाए। इस तरह यह स्पष्ट है कि दूसरा सदन जो कर सकता है और उससे जो अपेक्षाएं हैं, उसे गवर्नर भी वीटो, विघटन तथा पुनर्विचार के अपने अधिकारों से कर सकता है। यदि मेरी बात मान ली जाती है, तो दूसरा सदन निर्वाचित सदन का बेकार दुमछल्ला सिद्ध होगा।

  1. मुझे पूरा विश्वास है कि उपयोगिता के सिद्धान्त की अनदेखी करके मेरे साथी कुछ अन्य देशों में विद्यमान व्यवस्था के बहकावे में नहीं आ जाते, यदि वे इस बारे में सुनिश्चित कर लेते कि उनकी इस धारणा के सुनिश्चित आधार हैं कि एक अकेला सदन बिना सोचे समझे जल्दी में कानून बना सकता है। मुझे लगता है कि उनकी धारणाएं नितांत निराधार हैं और वे आधुनिक राजनीति के तौर तरीके से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। आज के युग में कोई भी विधायी प्रस्ताव विधायिका के सामने अचानक आसमान से नहीं टपक पड़ता। इसके विपरीत हर विधायी प्रस्ताव को कानून बनने तक जनता के विचार - विमर्श और आलोचना की लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यह प्रक्रिया वर्षों तक चलती है। यदि कानून की पुस्तक में हर कानून का पूर्ण इतिहास

खोजा जाए, तो पता चलेगा कि उसकी कल्पना और उसके अधिनियम के बीच जो अर्सा गुजरता है, वह बहुधा छोटा होने के बजाए लम्बा ही होता है। ऐसी स्थिति में यह धारणा बना लेना कि निर्वाचित सदन जल्दबाजी में काम करता है, इसलिए उस पर लगाम लगाने की आवश्यकता है, इसी कहावत को चरितार्थ करता है कि जब मर्ज ही नहीं, तो इलाज किसका।

  1. मेरे साथी दरअसल कोई संशोधी सदन नहीं बल्कि एक प्रशासी वर्ग चाहते हैं। इस वर्ग को जो दायित्व सौंपा गया है, जिस मताधिकार के आधार पर उसके गठन का प्रयास किया गया है और उसे जिन अधिकारों को दिए जाने का प्रस्ताव है, उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है। मैं मानता हूँ कि मुझे उनकी इस सोच पर कुछ अचरज ही हुआ कि विधायिका को अधिकारों की सुपुर्दगी को एक दूसरे सदन के गठन द्वारा सुरक्षा चक्र प्रदान किया जाए ताकि इस बात की गारंटी मिल जाए कि इन अधिकारों का इस्तेमाल किसी समुदाय विशेष का हित विशेष के अहित में किया