3. प्रांतीय विधायिका - Page 94

प्रांतीय विधायिका

77

जा सके। क्योंकि वास्तविक कामना यह नहीं है, जैसा कि मैं उसे समझता हूँ कि हम ऐसा सुधार करें, जिसमें राजनीतिक केन्द्र का संतुलन अपरिवर्तनीय रहेगा, बल्कि यह है कि कतिपय सीमाओं के भीतर वह चोरी - चोरी जनसमूह की ओर प्रवाहित होगा। सत्ता की सुपुर्दगी को सुरक्षा चक्र प्रदान करने का जो यह प्रयास है, उससे तो ऐसा दीख पड़ता है कि मेरे साथी सोचते हैं कि सर्वाधिक वांछनीय प्रकार का सुधार वह है, जो सम्बद्ध विभिन्न समुदायों के बीच सत्ता - संतुलन में परिवर्तन नहीं करता। मेरे विचार में ऐसा दृष्टिकोण रखने वाले लोग या तो राजनीतिक सुधार का अर्थ नहीं जानते और यदि जानते भी हैं, तो ऐसा सुधार नहीं चाहते, जो यथास्थिति में खलल डाले। जहां तक मेरा संबंध है, मैं इस तथ्य के बारे में पूर्ण आश्वस्त हूँ कि सभी सुधारों का मूलमंत्र यह है कि विभिन्न वर्गों के बीच सत्ता - संतुलन में परिवर्तन किया जाए। यदि निम्न वर्ग को लाभ होता है, तो दूसरे वर्ग को हानि होगी ही। यदि हर वर्ग को पहले से ज्यादा राजनीतिक सत्ता नहीं मिल पाती, तो कोई वास्तविक सुधार होगा ही नहीं। यह सोचना बेकार है कि निम्न वर्ग या सुधार में रुचि रखने वाला कोई वर्ग किसी उपाय से या तो इसलिए संतुष्ट हो जाएगा कि उसे राजनीतिक सुधार का उपाय कहा जाता है या फिर इसलिए कि आमूल परिवर्तन के प्रस्ताव के नाम पर वह स्थिति को ज्यों का त्यों बनाए रखने का प्रयास करता है। स्पष्ट शब्दों में यह कहना कहीं बेहतर होगा कि संतोष का आधार यह भी नहीं होगा कि राजनीतिक सत्ता की सुपुर्दगी इस प्रकार ढाली जाए कि सत्ता प्रवाह वर्ग समूह तक सीमित रह जाए और जन - वर्ग तक न पहुंच पाए। इसलिए मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं सुधार की इस योजना का भागीदार नहीं बनना चाहता।

  1. भले ही हम यह स्वीकार भी कर लें कि दूसरा सदन एक आवश्यकता है, फिर भी इसके गठन में एक बहुत बड़ी कठिनाई है। 1917 की मांटेग्यू - चेम्सफोर्ड रिपोर्ट में प्रांतों में दूसरे सदनों के गठन पर सावधानीपूर्वक विचार किया गया था, परन्तु हर पहलू पर विचार करने के बाद उसमें इस प्रस्ताव का विरोध किया गया था। उसमें कहा गया हैः ‘‘इस विचार के प्रति हमें गंभीर व्यावहारिक एतराज दीख पड़ते हैं। कई राज्यों में हमें दो सदनों के लिए पर्याप्त संख्या में उपयुक्त सदस्य नहीं मिल सकेंगे। हमें यह भी आशंका है कि दूसरे सदन में मुख्यतः जमींदारों तथा पैसे वालों के हितों का प्रतिनिधित्व रहेगा और वह उस विधान के विरुद्ध बहुत असरदार रोक साबित हो सकता है, जो ऐसे हितों को प्रभावित करे। पुनः यदि दूसरे सदन में बड़े - बड़े जमींदारों की उपस्थिति होगी, तो उसका दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह हो सकता है कि अपने ही वर्ग के अन्य लोगों को वे लोग मत नहीं प्राप्त करने देंगे। हम सोचते हैं कि दो सदनों के कारण जो विलम्ब होगा वह इस प्रणाली को इतना बोझिल बना देगा कि प्रान्तीय विधायिका का काम चलना दुभर हो जाएगा। इसलिए फिलहाल हमने फैसला किया है कि प्रांतों में दो सदनों वाली प्रणाली न हों।’’ 1917 में दूसरे