3. प्रांतीय विधायिका - Page 95

78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सदन के बारे में जो एतराज उठाए गए थे, उनकी आज भी उतनी ही सार्थकता है। मैं आश्वास्त हूँ कि प्रेसिडेंसी में पर्याप्त संख्या में इतने प्रख्यात व्यक्ति नहीं हैं कि वे दोनों सदन चला सकें। दूसरा सदल पहले को या पहला सदन दूसरे को खा जाएगा। दोनों को बनाने की पर्याप्त सामग्री नहीं है। इन हालात में यह बेहतर होगा कि दो सदनों के स्थान पर एक ही प्रभावी सदन रहे। इस कारण मैं प्रेसिडेंसी में दूसरे सदन का विरोध करता हूँ।

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विधायिका के अधिकार

  1. अध्यक्ष की नियुक्ति और उसे पदच्युत करने का अधिकार : 1919 के सुधारों के पहले गवर्नर, जो प्रांतीय कार्यपालिका का प्रमुख था, प्रांतीय विधायिका का अध्यक्ष होता था। 1919 में लागू सुधारों से प्रांतीय विधायिका ने यह अधिकार प्राप्त कर लिया कि वह अपने किसी सदस्य को उसका अध्यक्ष निर्वाचित कर सके और चाहे तो उसे पद से हटा सके। यह एक महत्वपूर्ण विशेषाधिकार था, लेकिन इस विशेषाधिकार के उपयोग में कुछ शर्तें लगी थीं। अध्यक्ष की नियुक्ति की गवर्नर से पुष्टी करानी होती थी और उसको हटाए जाने पर भी उसकी सहमति आवश्यक थी। ये शर्तें उस समय की अवशेष हैं। कार्यपालिका विधायिका से सर्वोपरि थी। डोमिनियनों के संविधान में उनके लिए कोई स्थान नहीं है। वे विधायिका की स्वतंत्रता के प्रतिकूल हैं और उन्हें हटाना ही होगा। हम यह मानते हैं कि निश्चय ही अध्यक्ष कार्यपालिका के नियंत्रण में न रहे, पर प्रश्न यह है कि क्या उसे न्यायपालिका के नियंत्रण से भी मुक्त रखा जाए। भारत सरकार अधिनियम की धारा 110 में यह व्याख्या की गई है कि वे कौन से अधिकारी और मामले हैं, जो उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से मुक्त हैं। विधान परिषद् का अध्यक्ष उन अधिकारियों में शामिल नहीं है जिन्हें यह उन्मुक्ति मिली हुई है। इस स्थिति में विधायिका का अध्यक्ष उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसका अर्थ है कि अध्यक्ष के रूप में उसके आचरण को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। ऐसी आशंका है कि इससे खिजाऊ मुकदमेबाजी के लिए भारी गुंजाइश पैदा हो जाएगी और विधायिका के कार्य - संचालन में भारी विलंब होगा। इसे दूर करने के लिए कहा गया है कि अध्यक्ष को न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से मुक्त रखा जाए। मैं इस परिवर्तन के विरुद्ध हूँ और यथास्थिति चाहता हूँ।

  2. विशेषाधिकारों की व्याख्या का अधिकार : कोई भी व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि यह आवश्यक है कि विधायिका को उसके लिए समुचित रूप से जरूरी हर अधिकार दिया जाए, ताकि वह बनी रहे और अपने लिए नियत कर्तव्यों का समुचित रूप से पालन कर सके। वर्तमान कानून के अधीन प्रांतीय विधायिकाओं की स्थिति बहुत असंतोषजनक है। विधायिका के सदस्यों को उन्मुक्ति के केवल कुछ