प्रांतीय विधायिका
79
अधिकार दिए गये हैं। विधान परिषद् के नियमों के नियम 17 के अधीन अध्यक्ष को मामूली से अधिकार प्राप्त हैं। उनके अधीन वह अनुशासन भंग करने वाले किसी सदस्य को सदन से बाहर निकाल सकता है। इसके अलावा कानून विधायिका को कोई ऐसा प्राधिकार नहीं देता, जिसके अधीन वह ऐसे किसी गलत काम से अपनी रक्षा कर सके, जो उसके काम में खलल डालने या उसकी गरिमा को गिराने के लिए किया गया हो। विधायिका को अब और अधिक समय तक ऐसे अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अतः मैं यह सिफारिश करता हूँ कि डोमोनियन विधायिकाओं की भांति प्रांतीय विधायिकाओं को विहित सीमाओं के भीतर यह अधिकार दिया जाए कि वे कानून द्व ारा उन अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को परिभाषित कर सकें जिन्हें वे अपने हित के लिए जरूरी समझती हों।
प्रक्रिया को विनियमित करने का अधिकार : बंबई विधान परिषद् का कार्य संचालन भारत सरकार अधिनियम की धारा 73 घ (6) के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार होता है। इसी अधिनियम की धारा 72 घ (7) के अधीन बनाए गए स्थायी आदेश इन नियमों की अनुपूर्ति करते हैं। प्रक्रिया की इस संहिता को तैयार करने में प्रांतीय विधायिका का कोई हाथ नहीं रहा है। स्थायी आदेश गवर्नर-जनरल इन काउंसिल ने बनाए थे, हालांकि विधायिका को उनमें संशोधन के सुझाव देने की आजादी थी। परन्तु ये नियम धारा 129 क के उपबंधों के अधीन गवर्नर जनरल इन काउंसिल बनाती है। उनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि प्रांतीय विधायिका को उनमें कोई परिवर्तन या उन्हें रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है। मेरी राय है कि प्रांतीय विधायिका को यह अधिकार मिले कि वह अपनी प्रक्रिया को स्वयं ही विनियमित करे। लगता है कि प्रांतीय विधायिकाओं को ऐसी स्वतंत्रता देने में कठिनाई यह रही होगी कि कुछ नियमों में ऐसे उपबंध हैं, जो अन्य देशों में उनके संवैधानिक कानून के अंग हैं, जिससे नियमों में संशोधन करने का अधिकार संविधान में संशोधन करने का अधिकार बन जाता है। परन्तु इस कठिनाई से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है, यदि प्रयास किया जाए कि ऐसे नियम भारत सरकार अधिनियम की धारा के रूप में बनाए जाएं। यदि ऐसा किया जाता है, तो जो सिफारिशें मैंने की हैं, उन्हें लागू किया जा सकता है और प्रांतीय विधायिकाओं को आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा की डोमिनियन विधायिका की बराबरी पर लाया जा सकता है।
कानून बनाने का अधिकार : भारत सरकार अधिनियम की धारा 80 ग में यह व्यवस्था है कि किसी भी स्थानीय विधायिका के किसी सदस्य के लिए यह वैध नहीं होगा कि वह गवर्नर, लैफ्टिनेंट गवर्नर या चीफ कमिश्नर की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई ऐसा विधेयक पेश कर सके, जिसका संबंध प्रांत के लोग राजस्व या उन राजस्वों पर प्रभार लागू करने से हो। यह धारा विधायिका के अधिकारों पर कठोर अंकुश है। यह उन दिनों की याद दिलाती है जब लोगों की देश के कामकाज के प्रशासन में