3. प्रांतीय विधायिका - Page 97

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कोई आवाज नहीं होती थी। इन अधिकारों को बरकरार रखना उस विधायिका के प्रतिकूल होगा जो कार्यपालिका से कहीं ऊंची है। इसलिए इस धारा को हटाया जाए। गवर्नर को फिर भी यह अधिकार रहेगा कि वह अपने वीटो अधिकार से उस कानून को रद्द कर दे, जो परिषद् ने पास किया हो। यह अधिकार पर्याप्त होना ही चाहिए। उससे अधिक अधिकार उस हैसियत के अनुरूप नहीं होगा, जिसे वह पूर्ण मंत्रिमंडलीय दायित्व प्रणाली के अधीन प्राप्त करेगा।

  1. विनियोग का अधिकार : विधान परिषद् को धारा 72 घ के अधीन यह अधिकार है कि वह किसी मांग को मंजूर करे या न करे या उसमें उल्लिखित राशि को कम कर दे, वह चाहे तो समूचे अनुदान को कम कर दे या फिर अनुदान में शामिल किसी मद के खर्च में कटौती या उसका लोप कर दे। यह अधिकार कुछ महत्वपूर्ण उपबंधों के तहत मिला हुआ है। यदि वह मांग किसी आरक्षित विषय के बारे में हो, तो गवर्नर को यह अधिकार है कि वह विधायिका के फैसले को रद्द कर सकता है, यदि वह प्रमाणित कर दे कि मांग में जिस खर्च की व्यवस्था की गई है, वह विषय के बारे में उसके दायित्व - निर्वाह के लिए अति आवश्यक है। धारा 72 घ, खंड 2 (ख) में शामिल एक अन्य परन्तुक के अनुसार विधायिका की विनियोग संबंधी शक्तियां सीमित कर दी गई हैं। इसके तहत गवर्नर को यह अधिकार है कि वह आपात - स्थिति में ऐसे व्यय का अधिकार दे दे, जो उसकी राय में प्रांत की सुरक्षा और शांति के लिए या किसी विभाग के संचालन के लिए आवश्यक हो। यह भी विधान परिषद् के अधिकारों पर अति कठोर अंकुश है। मेरा सुझाव है कि अधिनियम से इन्हें निकाल दिया जाए। पहले परन्तुक के अधीन गवर्नर को, जो अधिकार दिए गए हैं, उनके लिए ऐसी सरकार में कोई स्थान नहीं है, जो पूर्णतया उत्तरदायी हो और जिसमें कामकाज संबंधी दिशा - निर्देश के लिए गवर्नर पर दायित्व नहीं डाला गया हो। प्रांत की सुरक्षा और शांति गवर्नर का विषेश दायित्व नहीं होगा क्योंकि वह अब तो कार्यपालिका का दायित्व होगा। अतः दूसरे परन्तुक के द्वारा गवर्नर को जो अधिकार दिए गए हैं, वे अनावश्यक हैं और वे उससे वापस ले जाने चाहिएं।

  2. विधायिका के वित्तीय अधिकारों पर एक और प्रतिबंध का प्रावधान धारा 72 घ (3) में है। इसके अनुसार कार्यपालिका के लिए यह अनावश्यक नहीं है कि उसमें उल्लिखित कतिपय विशिष्ट मदों से संबंधित व्यय को वोट के लिए विधायिका के पास भेजे। नतीजा यह है कि प्रांत के बजट में स्थायी विनियोग की बहुत सी ऐसी मदें हैं, जिन्हें विधान परिषद् छू ही नहीं सकती। सैद्धांतिक रूप से व्यय की हर मद पर हर वर्ष विधायिका की स्वीकृति ली जानी चाहिए। परन्तु लगभग हर देश के बजट में ऐसा स्थायी विनियोग होता है, जिस पर हर वर्ष विधायिका की स्वीकृति आवश्यक नहीं। यहां तक कि इंग्लैंड में भी स्थायी विनियोगों की सूची काफी लम्बी हो गई है। युद्ध पूर्व वह कुल खर्च का एक-तिहाई भाग थी। कार्यपालिका पर इस बात के लिए