3. प्रांतीय विधायिका - Page 98

प्रांतीय विधायिका

81

विश्वास किया जा सकता है या नहीं कि वह सरकारी खर्च की राशि और उसका स्वरूप तय करे, वह इस बात पर निर्भर है कि विकास का वह चरण क्या है, जिस पर कि जनता संवैधानिक सरकार की प्राप्ति में पहुंची है। यदि स्थिति ऐसी है कि सरकार और जनता के राजनीतिक अधिकारों के बारे में अनिश्चय है, तो यह निरापद नहीं होगा कि विधायिका की स्वीकृति के बिना सरकारी खर्च के ऐसे स्थायी विनियोग की अनुमति दी जाए, जैसी कि व्यवस्था धारा 72 घ (3) में है। यह ठीक ही है कि प्रांतों में उत्तरदायी सरकार का आधार अभी तैयार ही किया जा रहा है और प्रांतीय विधायिकाओं की कार्यपालिका के अतिक्रमणों से सतर्कतापूर्वक रक्षा करनी होगी। मैं सोचता हूँ कि इसके साथ ही साथ यह भी स्वीकार कर ही लिया जाए कि सरकारी कामकाज पर लोक - नियंत्रण के अधिकार को मान्यता मिले और नये संविधान के अधीन उसे पूर्णतः स्वीकार कर लिया जाए, ताकि सरकारी प्राधिकार के मनमाने उपयोग पर विभिन्न अंकुश हों और सरकारी खर्च की हर मद की वार्षिक स्वीकृति पर आग्रह करने की जरूरत न पड़े। इस तरह मैं स्थायी विनियोग कि इस योजना के विरुद्ध नहीं हूँ, परन्तु मैं यह नहीं मानता कि इसकी कानूनी व्यवस्था की जाए, जिससे विधायिका के अधिकारों में कटौती हो। कानूनी व्यवस्था पर विधायिका पर यह पाबंदी लग जाएगी कि वह वोट की अपेक्षा न रखने वाली मदों के नियंत्रण संबंधी नीति पर भी विचार नहीं कर सकेगी। वोट की अपेक्षा न रखने वाली मदों की व्यवस्था सुविधा के लिए होनी ही चाहिए पर उसके लिए विधायिका पर कोई कानूनी अंकुश नहीं होना चाहिए।

  1. कार्यपालिका पर नियंत्रण का अधिकार : मूलतः 1919 के सुधार वाले संविधान के अधीन प्रांतीय विधायिकाएं तीन प्रकार से मंत्री पर नियंत्रण रख सकती थीं : (1) विधान द्वारा, (2) आपूर्ति रोक कर, और (3) वेतन न देकर या घटाकर। केवल दूसरे और तीसरे प्रकार से ही विधायिका मंत्रियों के प्रशासन पर नियंत्रण रख सकती थी। यह नियंत्रण साल में एक बार ही किया जा सकता था। इसलिए वह अपर्याप्त था। अतः 1926 में यह व्यवस्था की गई कि मंत्री के प्रति विश्वास के अभाव का प्रस्ताव रखा जाए। मंत्री के कार्यों को नियंत्रित करने के लिए विधायिका के ये अधिकार काफी हैं और इनके पीछे उद्देश्य यह था कि मंत्री अपने कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होंगे। भावी मंत्रीमंडल संयुक्त उत्तरदायित्व के सिद्धान्त पर आधारित होगा, जिसके अनुसार मंत्री खड़े होंगे एक साथ और गिरेंगे भी एक साथ। विधायिका के वर्तमान अधिकारों में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वह समूचे मंत्रिमंडल को बर्खास्त करना चाहती है। मैं सोचता हूँ कि इस आश्य के उपबंध किए जाएं और एक नये प्रकार का प्रस्ताव जोड़ा जाए जिसे अविश्वास प्रस्ताव के नाम से जाना जाए और जो मौजूदा प्रस्ताव से भिन्न हो। इसका नया नाम होना चाहिए। ‘‘किसी विशिष्ट मामले में मंत्री की नीति को चुनौती देने वाला प्रस्ताव’’। यह सुझाव मुडीमैन कमेटी ने रखा था, पर उसे स्वीकार नहीं किया गया।