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श्री बी.एन. राव उपसचिव तथा मसौदे का ढांचा तैयार करने वाले श्री एस.एन. मुखर्जी और संविधान समिति सचिवालय के कर्मचारी वर्ग के मिले सहयोग के प्रति मैं समिति की कृतज्ञता को दर्ज किए बगैर संविधान के इस मसौदे को आपके समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकता।
आपका विश्वासपात्र
बी. आर. आंबेडकर ख्1,
संविधान का मसौदा 26 फरवरी, 1948 को भारत सरकार के गैजट में लोगो की जानकारी के लिए तथा लोगों की राय जानने के लिए प्रकाशित किया गया। करीब आठ महीनों तक वह लोगों के पास था। उसके बाद 4 नवम्बर, 1948 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने उसे संविधान सभा के समक्ष पेश किया। इस अवसर पर उन्होंने जो भाषण दिया उसका संविधान सभा के और देश के इतिहास में असाधारण महत्व है। इस भाषण के असर के कारण ही संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों ने डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा यह कहकर की कि वह प्रकांड पंडित, संविधान निर्माण के शिल्पकार, संविधान के बारे में पूरे अधिकार के साथ भाष्य करने वाले, गहन अध्येता, काबीलियत रखने वाले हैं। चुनिदा सदस्यों की इस संदर्भ में भावनाएं व्यक्त करने वाले भाषण हुए जिनमें से कुछ हिस्से यहां दिए जा रहे हैं -
टी. टी. कृष्णम्मा चारी - सदन को अहसास होगा कि आपके द्वारा नियुक्त किए गए सात में से एक सदस्य ने इस्तीफा दिया। उनकी जगह अन्य की नियुक्ति की गई। एक सदस्य की मृत्यु हुई, लेकिन उस पद को भरा नहीं गया। एक सदस्य अमेरिका में थे उनकी जगह किसी को नहीं दी गई। एक और सदस्य रियासत के कामों में उलझे हुए थे, इसलिए उनकी जगह भी खाली थी। एक या दो सदस्य दिल्ली से काफी दूर रहा करते थे और उनकी सेहत ठीक नहीं थी इसलिए वह भी उपस्थित नहीं रह पा रहे थे। सो अंततः संविधान बनाने की जिम्मेदारी पूरी तरह डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर पर आई। उन्होंने यह काम पूरी जिम्मेदारी के साथ सफलतापूर्वक पूरा किया। उनका यह कार्य प्रशंसनीय है, इसमें कोई दो राय नहीं। हम सब उनके प्रति कृतज्ञ हैं।
काजी सैय्यद करीमुद्दीन - संविधान का मसौदा विचारार्थ रखने के प्रस्ताव पर डॉ. अम्बेडकर ने भूमिका में जो वक्तव्य दिया, उसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं। उनका भाषण ध्यान देने योग्य था और मुझे यकीन है कि आने वाली पीढि़यां उन्हें महान संविधानकर्ता के रूप में जानेगी।
डॉ. पी. एस. देशमुख- मेरे सम्माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर का भाषण उच्चकोटि का था। प्रस्तुत किए गए मसौदे पर दिया गया वह प्रभावपूर्ण वक्तव्य था। सब जानते ही हैं कि वह एक प्रख्यात अधिवक्ता हैं और मुझे लगता है कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभाई। अगर उन्हें पूरी छूट मिलती तो इस संविधान को वे शायद अलग रूप दे पाते।
डॉ. जोसेफ अल्बन डिसूजा - शुरुआत से लेकर आखिर तक विद्वानों को शोभा