255 4-11-1948 संविधान के तहत अगर कुछ गलत बातें होती हैं तो जिम्मेदारी संविधान की नहीं मनुष्य की दुष्टता की होगी - नई दिल्ली - Page 123

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जैसा कुछ नहीं है। वह कोई उधारी का हिस्सा नहीं है। संविधान की मौलिक कल्पना पर किसी के बौद्धिक संपदा का अधिकार नहीं होता। मुझे अगर किसी बात का बुरा लगता हो तो वह इस बात का कि भारत सरकार कानून, 1935 से लिए प्रावधानों का बड़ा हिस्सा ज्यादातर प्रशासन के विवरण से जुड़ा हुआ है। मैं मानता हूं कि प्रशासन के विवरण को संविधान में स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। मेरी इच्छा है कि संविधान में इस हिस्से को टालने का उपाय मसौदा समिति ढूंढे लेकिन उसे शामिल करने की जरूरत का समर्थन अगले वाक्य को पढ़ कर किया जा सकता है। ग्रीस के इतिहास के दार्शनिक ग्रोट ने कहा है कि,

‘‘विशिष्ट वर्ग के केवल कुछ बहुसंख्यक लोगों द्वारा ही नहीं वरन् सबके द्वारा आदरभाव के साथ नैतिकता का पालन किया जाना स्वतंत्र और शांतिपूर्ण प्रशासन की अनिवार्य शर्त है। अपनी वर्चस्व स्थापित करने की सामर्थ्य न होने वाला कोई भी बलदंड और दुराग्रही अल्पसंख्यकों का वर्ग स्वतंत्र संस्थाओं के लिए काम करना असंभव कर देता है।’’

ग्रोट की राय में आदर सहित नैतिकता अर्थात्, ‘‘संवैधानिक सिद्धातों के बारे में सर्वोच्च स्तर का आदरभाव मन में रखते हुए कानून की तय मर्यादा के अंदर रहकर काम करने वाले शासनों का आदेशों का पालन करते हुए अपनी राय और कृति मुक्त होकर व्यक्त करनी चाहिए। जनता से संबंधित लिए गए निर्णयों के अनुसार सत्ताधारियों की संयम के साथ समीक्षा करनी चाहिए। साथ ही विभिन्न पार्टियों की रस्साकशी की कटुता स्वाभाविक होते हुए भी संवैधानिक तत्वों के बारे में आपका जितना ही विरोधियों के मन में भी आदर है इसका विश्वास देश के हर नागरिक के मन में प्रस्फुटित होना चाहिए।’’ (सुनिए... सुनिए)।

जनतांत्रिक संविधान को शांतिपूर्ण तरीके से लागू करने के लिए संवैधानिक नैतिक प्रचार की जरूरत है ऐसा हर कोई मानता है लेकिन उसके साथ जुड़ी दो अन्य बातें दुर्भाग्य से मानी नहीं जातीं। उनमें से पहली बात है प्रशासकीय स्वरूप का संविधान के स्वरूप से निकट का संबंध होता है। प्रशासन के स्वरूप की संविधान के स्वरूप के साथ घनिष्ठ समंजस्य बैठना जरूरी होता है। दूसरी बात यह कि संविधान के स्वरूप में बदलाव किए बिना केवल प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव कर उसके द्वारा संविधान को प्रभावहीन कर और विरोध कर संविधान पर अमल करने की राह में बाधाएं उत्पन्न करना पूरी तरह संभव है। इतिहासकार ग्रोट के कथनानुसार जहां लोगों के बीच नैतिकता बनाना प्रस्फुटित है वहां प्रशासनिक विवरणों को संविधान से हटा कर उसे विधानसभा को सौंपने की जोखिम स्वीकारी जा सकती है। सवाल यह है कि इस प्रकार की निर्माण को नैतिकता सहज भावना नहीं है। उसे पालना-पोसना पड़ता है। हमारे लोगों के बीच अभी वह पैदा नहीं हुई है। हमें यह सीखना होगा। भारतीय लोकतंत्र भारतीय मिट्टी का केवल ऊपरी आवरण है। यह मिट्टी मूलतः अलोकतांत्रिक है।

इन स्थितियों में प्रशासनिक व्यवस्था निर्माण करने की सूचनाओं के लिए विधानसभा