106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और केवल स्वार्थ के स्तर का जीवन जिया है और इन ग्राम राज्यों के कारण ही भारत का नाश हुआ ऐसा मैं समझता हूं। प्रांतवाद और जातिवाद का निषेध करने वाले गांवों के समर्थन में आगे आए हैं इसका मुझे आश्चर्य होता है। गांव क्या हैं? केवल स्थानीयता के कुंड, अज्ञान की गुफा, संकुचित मानसिकता और जातिवाद। इसीलिए मसौदा संविधान ने गांवों को नकारा और व्यक्ति को घटक माना इसकी मुझे खुशी है।
अल्पसंख्यकों को दी गई छूट के प्रबंधों के कारण भी मसौदा संविधान की आलोचना की जा रही है। इसके लिए मसौदा समिति जिम्मेदार नहीं। संविधान सभा द्वारा लिए गए निर्णयों पर वह अमल करती है। अल्पसंख्यकों को सहूलियतें देने का जो निर्णय संविधान सभा द्वारा लिया गया है और जिस पर अमल किया जा रहा है मेरी राय में वह सही है। इस बारे में मेरे मन में बिल्कुल संदेह नहीं। इस देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों ने गलत मार्ग अपनाया। अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को नकारना बहुसंख्यकों की गलती है और अल्पसंख्यकों द्वारा अपने अल्पसंख्यकत्व को सीने से लगाए रखना, उसे चिरस्थायी बनाने की कोशिश करना भी उतना ही गलत है। दोनों उद्देश्य साध्य हो सकें ऐसे उपाय ढूंढना जरूरी है। इस दिशा में आगे बढ़ने की शुरुआत के तौर पर अल्पसंख्यकों का अस्तित्व मानना ही होगा। कोशिश यह भी की जानी चाहिए कि किसी समय अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक एकरूप हों। संविधान सभा द्वारा सुझाए गए उपायों का स्वागत होना चाहिए। क्योंकि उनके द्वारा बताए गए उपायों से ही यह दोहरा उद्देश्य साध्य किया जा सकता है। धर्मांधता की भावना को बल देकर अल्पसंख्यकों को दी जा रही सहूलियतों का विरोध करने वालों को मैं दो बातें बताना चाहता हूं। पहली बात यह कि अल्पसंख्यक विस्फोटक शक्ति होती है। उसका विस्फोट होने से पूरे राज्य के बिखर जाने का खतरा होता है। यूरोप का इतिहास इसी प्रकार की भरपूर और भयानक वास्तविक घटनाओं का प्रत्यक्ष गवाह है। दूसरी बात यह है कि भारत के अल्पसंख्यकों ने अपना अस्तित्व बहुसंख्यकों के हाथों सौंपना स्वीकार किया है। आयरलैंड का विभाजन टालने के लिए किए गए लेन-देन के इतिहास में रेडमंड ने कार्सन से कहा था कि प्रोटेस्टंट अल्पसंख्यकों के लिए आपको जो चाहिए उन सहूलियतों की मांग कीजिए लेकिन आयरलैंड को एक ही रहने दीजिए। तब कार्सन ने उन्हें जवाब दिया था कि आपके द्वारा दी जाने वाली सहूलियतें चूल्हे में झोंकिए। हमें यह बिल्कुल मंजूर नहीं कि आप हम पर राज करें। भारत के किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय ने ऐसी भूमिका नहीं अपनाई। और बहुसंख्यकता राजनीतिक न होकर जातीय है। इस प्रकार के जातीयवादी बहुसंख्यकों का राज्य अल्पसंख्यकों द्वारा निष्ठा के साथ स्वीकारा गया है। इसीलिए अल्पसंख्यकों के प्रति भेदभाव न करना अपना कर्तव्य है। इसका अहसास बहुसंख्यकों को रखना होगा। अल्पसंख्यकत्व टिका रहे या एकसार हो यह बहुसंख्यकों के बर्ताव पर ही निर्भर होगा। अल्पसंख्यकों के विरोध में भेदभाव करने की आदत बहुसंख्यक जिस क्षण छोडेंगे उस क्षण से अल्पसंख्यकों के अस्तित्व का कोई कारण नहीं बचेगा। वे एकसार हो जाएंगे।