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मसौदा संविधान के मौलिक अधिकारों से जुडे हिस्से की सबसे अधिक आलोचना हुई है। कहा जाता है कि मौलिक अधिकारों की व्याख्या करने वाले 13वें अनुच्छेद के कई अनुच्छेदों को बरकरार रवते हुए छंटनी की गई। और इन अपवादों ने मौलिक अधिकारों को निगल लिया है। इन अनुच्छेदों का धिक्कार करते हुए कहा गया है कि यह एक तरह की धोखाधड़ी है। समीक्षकों की राय में मौलिक अधिकारों का निरपेक्ष होना आवश्यक है। वरना वे मौलिक अधिकार नहीं रहते। समीक्षक अपनी दलीलों के समर्थन में अमेरिकी संविधान का तथा उस संविधान से पहले इस सुधारों में शामिल अधिकार विधेयकों का सहारा लेते हैं। कहा जाता है कि अमेरिका के अधिकार संबंधी विधेयक में मौलिक अधिकार वास्तव हैं, क्योंकि वे किसी भी सीमा और अपवादों से नियंत्रित नहीं हैं।
खेद के साथ मुझे यह कहना पड़ रहा है कि मौलिक अधिकारों के संदर्भ में सारी समीक्षा गलतफहमी पर आधारित है। पहली बात यह कि मौलिक अधिकारों को मौलिक न होने वाले अधिकारों से अलग-अलग करने के लिए दिए गए आधार पर की गई समीक्षा की नींव मजबूत नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता कि मौलिक अधिकार अनिर्बंध होते हैं और मौलिक न होने वाले अधिकार अनिर्बंध नहीं होते। इन दोनों में फर्क यही है कि मौलिक न होने वाले अधिकारों का निर्माण पार्टियों के बीच होने वाले करारों से होता है तो मौलिक अधिकार कानून की देन हैं। मौलिक अधिकार राज्य की देन हो तो भी राज्य उन पर सीमाएं नहीं लगा सकता ऐसा कहा नहीं जा सकता।
दूसरी बात यह कि अमेरिका में स्वछंद मौलिक अधिकार हैं यह कहना गलत है। अमेरिका के संविधान और मसौदा संविधान में जो फर्क है वह आकार के बारे में है, मूल उद्देश्य के बारे में नहीं। अमेरिका के मौलिक अधिकार स्वछंद नहीं हैं इसमें कोई दो राय नहीं। मसौदा संविधान में शामिल मौलिक अधिकारों के अपवादों के समर्थन में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय के एक मामले का जिक्र किया जा सकता है। मसौदा संविधान के अनुच्छेद 13 में शामिल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर जो रोक है उनके समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के कम से कम एक मामले का जिक्र किया जा सकता है। मसौदा संविधान के अनुच्छेद 13 में शामिल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर जो रोक है उनके समर्थन में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय का जिक्र करना काफी होगा। अपेक्षित बदलाव लाने के लिए हिंसात्मक मार्ग को अपनाने वालों को सजा देने के उद्देश्य से न्यूयार्क अपराध अराजकता कानून की (New York Criminal Anarchy Law ) संवैधानिकता के बारे में गिटलॉ खिलाफ न्यूयॉर्क ( Gitlaw X Newyork ) के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि -
‘‘संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गैर-जिम्मेदाराना तरीके से बोलने अथवा प्रकाशित करने की बेरोका आजादी टोक नहीं है। कोई किस बात का चुनाव करे अथवा किसी को मनमाने तरीके से बोलने का पासपोर्ट मिला है ऐसी बात नहीं। अभिव्यक्ति की आजादी का गलत इस्तेमाल करने वालों को सजा नहीं मिलेगी ऐसा भी