109
मसौदा संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ दिशादर्शक सिद्धांत भी दिए गए हैं। संसदीय जनतंत्र के लिए बनाए गए संविधान में यह बिल्कुल नया है। संसदीय जनतंत्र के लिए निर्मित संविधान में ऐसे सिद्धांतों का प्रावधान केवल आयरिश स्वतंत्र राज्य के संविधान में किया गया है। इन दिशादर्शक सिद्धांतों की भी समीक्षा की गई है। ये केवल पवित्र घोषणाएं हैं, उनमें बंधनकारिता की सामर्थ्य नहीं ऐसा भी कहा जाता है।
स्पष्ट है कि यह अनावश्यक टिप्पणी है। कई शब्दों के माध्यम से संविधान ही यह कह रहा है।
अगर कोई कहे कि दिशादर्शक सिद्धांतों को कानून का समर्थनात्मक बल ही न मिले तो मैं यह मान सकता हूं। लेकिन अगर कोई यह कहे कि उसके पीछे कोई बंधनकारी सामर्थ्य नहीं है तो मैं उसे नहीं मान सकता। दिशादर्शक सिद्धांतों को अनिवार्य बनाने के लिए कानून के न होने के कारण वे निरर्थक हैं यह भी मैं नहीं मानता।
दिशादर्शक सिद्धांतों का स्वरूप उपनिवेश और भारत के गवर्नर को प्राप्त अनुदेशों के संलेखों (instrument of instructions) की तरह है। मसौदा संविधान ने राष्ट्रपति और राज्यपालों को इस तरह के संलेख देने की अनुशंसा की है। अनुदेशों के सलेखों का प्रावधान संविधान की 4थी अनुसूची में रखा है। अनुदेशों के संलेवों को ही दिशादर्शक सिद्धांत कहा गया है। अंतर केवल इतना ही है कि अनुदेश विधिमंडल और कार्यकारी मंडल को दिए गए हैं। मेरी राय में ऐसी बातों का स्वागत किया जाना चाहिए। शांति, सुव्यवस्था और अच्छी सरकार बने इसके लिए ही सत्ता उनके सुपूर्द की जाती है। लेकिन सत्ता के उचित उपयोग के लिए साथ-साथ अनुदेश देना भी जरूरी है।
एक और वजह से मसौदे में प्रस्तावित संविधान के अनुदेशों का समावेश न्यायसंगत ठहरता है। निर्माण किए गए मसौदा संविधान में देश के लिए जरूरी सरकारी कामकाज की व्यवस्था का सिर्फ प्रावधान रखा है। विशिष्ट राजनीतिक पार्टी को सत्ता में लाने के लिए कुछ देशों में अस्तित्व में आई योजनाओं की तरह की यह योजना नहीं है। संकल्पित व्यवस्था द्वारा जनतंत्र की परीक्षा में सफलता पाने के लिए किसके हाथ में सत्ता हो इसका फैसला पूरी तरह जनता के हाथों में ही सौंपा गया है और यह उचित भी है। लेकिन भले कोई भी सत्ता में आए वह मनमाने ढंग से सत्ता का इस्तेमाल नहीं कर सकता। सत्ता का इस्तेमाल करते हुए उन्हें अनुदेशों के साधनों का (instrument of instructions) - जिन्हें दिशादर्शक सिद्धांत भी कहा गया है। आदर करना ही होगा। वह उन्हें नजरंदाज नहीं कर सकता। उन्हें तोड़ने के लिए उसे न्यायालय में जवाब नहीं देना होगा। सत्ता प्राप्ति के लिए जब विभिन्न शक्तियां कोशिश करेंगी उस समय दिशादर्शक सिद्धांत कितने मूल्यवान होंगे इसका पता चलेगा।
अनुदेशों के साथ उनका पालन करने की अनिवार्यता का प्रावधान न होने के कारण संविधान में उनके शामिल किए जाने का विरोध करने की दलील सही नहीं। संविधान में