110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उन्हें कहां रखा जाए इस बारे में मतभेद हो सकते हैं जिन प्रावधानों पर अमल किए जाने की बंदिश नहीं उनको बंदिश वाले प्रावधानों के साथ थोड़ा अजीब लगेगा यह मैं मानता हूं। मेरी राय में उनका सही स्थान अनुसूची III (अ) और अनुसूची IV- में है, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को दिए अनुदेशों के संलेख हैं। क्योंकि, जैसा कि मैंने कहा था कार्यकारीमंडल और विधिमंडल अपने अधिकारों का प्रयोग कैसे करें यही बताने के लिए अनुदेशों के संलेखों की योजना है। हालांकि, यह केवल व्यवस्था का मामला हुआ।
कुछ समीक्षकों के अनुसार केंद्र सरकार बहुत अधिक बलशाली हुई है। कुछ लोगों की राय में उसे अधिक सामर्थ्यवान होना चाहिए। मसौदा संविधान इन दोनों का स्वर्णिम मध्य है। केंद्र को शक्ति प्रदान करने का आप भले कितना ही विरोध क्यों न करें, आप केंद्र को शक्तिशाली होने से रोक नहीं सकते। आधुनिक युग में सत्ता का केंद्रीकरण अनिवार्य है। अमेरिका की केंद्र सरकार का ही उदाहऱण लीजिए। संविधान से सीमित अधिकार मिलने के बावजूद आजतक की उसकी यात्रा में उसके मूल स्वरूप में काफी विस्तार हुआ है और वहां केंद्र सरकार के अधिक शक्तिशाली होने के कारण राज्य सरकारों के अधिकारों को ग्रहण लगा हुआ है, यही दिखाई देगा। यह आज की स्थितियों का असर है। ऐसी स्थितियों का असर भारत सरकार पर भी होने वाला है । भले कितनी भी कोशिश क्यों न की जाए उसे शक्तिशाली होने से कोई नहीं रोक सकता। दूसरी तरफ उसके शक्तिशाली होने की प्रवृत्ति का हमें विरोध करना चाहिए। जितना काम कर सकता है उससे अधिक उसे खाना नहीं चाहिए । उसकी ताकत उसके पद के अनुपात में होनी चाहिए। अपने ही वजन से अगर वह गिर पड़े तो यह गलत होगा।
मसौदा संविधान की समीक्षा करते हुए कहा जा रहा है कि इसमें केंद्र और प्रांतों के संवैधानिक संबंधों के लिए एक तरह का प्रावधान और केंद्र और संस्थानों के बीच के संवैधानिक संबंधों के लिए अलग तरह का प्रावधान रखा गया है। सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय नीति और यातायात से संबंधित मामलों के अलावा केंद्रीय सूची में समावेश किए गए अन्य सभी मामलों को स्वीकारना भारतीय संस्थानों के लिए अनिवार्य नहीं होगा। समवर्ती विषयों की सूची को स्वीकारने का उन पर बंधन नहीं होगा। संविधान परिषदों का गठन कर अपने संविधान निर्माण करने की आजादी उन्हें दी गई है स्पष्ट है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है और मेरी राय है कि यह असमर्थनीय है। इस तरह का भेदभाव देश की कार्यक्षमता के लिए भी जोखिम भरा साबित हो सकता है। जब तक यह भेदभाव जारी रहेगा तब तक केंद्रीय सत्ता अखिल भारतीय स्तर के विषयों पर अपना प्रभाव खो देगी। क्योंकि सभी विषयों के बारे में और सब ओर अगर सत्ता का इस्तेमाल करना संभव नहीं हो तो उसे सत्ता कैसे कहें? वह सत्ता ही नहीं। युद्ध की स्थितियां बन जाएं और कुछ क्षेत्रों में आवश्यक अधिकारों के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जाएं तो पूरे देश की सुरक्षा पर संकट आ सकता है। अधिक गंभीर बात यह है कि मसौदा संविधान में सभी