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बेमेल होने का आरोप प्रस्तावित संविधान में रखे गए सुधार संबंधी प्रावधानों पर लगाया जा रहा हैं। ये आरोप गलत धारणाओं पर आधारित हैं। संविधान निर्माण के समय संविधान सभा ने पक्षीय नजरिया नहीं अपनाया है। एक बेहतरीन और कार्यशील संविधान निर्माण से अधिक अन्य कोई भी स्वार्थ भरा उद्देश्य नहीं है। संविधान के अनुच्छेदों के बारे में सोचते हुए विशिष्ट मापदंडों के प्रयोग का नजरिया नहीं था। भविष्य की संसद द्वारा अगर संविधान सभा का रूप धारण किया तो उसके सदस्य पक्षीय नजरिया अपनाएंगे। और पक्षीय कार्यक्रमों को लागू करने में जो अनुच्छेद अड़ंगा पैदा करने वाले लगेंगे उसमें वे सुधार करेंगे। संसद स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों से प्रेरित हो सकती है। संविधान सभा के सामने लेकिन ऐसा कोई नजरिया नहीं है। संविधान सभा और भावी संसद में यही फर्क है। इससे साफ होता है कि संविधान सभा भले सीमित मतदान पद्धति से चुनी गई हो लेकिन केवल बहुमत से संविधान पारित करने के लिए वह विश्वासपात्र है। और संसद भले वयस्क मतदान पद्धति से चुनी गई हो फिर भी सुधार के लिए उसे भी समान अधिकार देने के लिए वह विश्वासपात्र है, ऐसा नहीं।
मुझे विश्वास है कि मसौदा समिति द्वारा तैयार किए गए मसौदा संविधान पर उठाई गई सभी आपत्तियों का मैंने यथोचित जवाब दिया है। पिछले आठ महीनों में संविधान लोगों के सामने विचारार्थ रखा गया था। इस दौरान संविधान पर व्यक्त की गई ध्यान देने योग्य प्रतिक्रियाएं आपत्तियों से मुक्त हैं ऐसा मुझे नहीं लगता । मसौदा समिति द्वारा बनाये गए संविधान को स्वीकार करना है अथवा नहीं, या मंजूर करने से पहले उसमें कुछ बदलाव करने हैं यह संविधान सभा को तय करना है।
लेकिन मैं यहां कहना चाहूंगा कि भारत के कुछ प्रांतीय विधानसभाओं ने संविधान के मसौदों पर चर्चा की है। बॉम्बे सीपी, प. बंगाल, बिहार, मद्रास और पूर्व पंजाब में चर्चा हुई। कुछ प्रांतीय विधानसभाओं में संविधान के आर्थिक प्रावधानों के बारे में और मद्रास में अनुच्छेद 226 के बारे में गंभीर आपत्तियां की गई थीं यह बात सही है। लेकिन ये अपवाद अगर छोड़ दें तो किसी भी प्रांतीय विधानसभा में संविधान के अनुच्छेदों पर कोई गंभीर आपत्ति नहीं की गई। कोई भी संविधान परिपूर्ण नहीं होता। और मसौदा संविधान अधिक अच्छा करने के उद्देश्य से मसौदा समिति खुद कुछ सुधारों का सुझाव रखने वाली है। लेकिन प्रांतीय विधानसभा में हुई चर्चा से मुझे यह कहने का साहस दिया है कि मसौदा समिति द्वारा तैयार किया गया संविधान शुरुआत के तौर पर इस देश के लिए निश्चित रूप से अच्छा है। मेरी राय में वह व्यावहारिक है, लचीला है और देश को शांति और युद्धजनित स्थितियों में एक सूत्र में बांधे रखने के लिए समर्थ है। मैं कह सकता हूं कि सचमुच नए संविधान के अंतर्गत अगर कुछ गलतियां रह गई हैं तो उसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान गलत है बल्कि हमें कहना पड़ेगा कि इंसान धूर्त था। महोदय, मैं संविधान प्रस्तुत करता हूं। ख्1,
- मूल अंग्रेजी भाषण के मराठी अनुवाद से अनूदित।