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की मानसिक स्थिति और साहस की तुलना अगर उस दौरान के साहस और मानसिक स्थिति के साथ की जाए तो क्या पता चलता है? 1946 के बेहद कठिन समय से हम संभले यह कोई छोटी-सी बात नहीं। अब आपके अंदर धैर्य आया है। अगर आपसे पूछा जाए कि - आप क्या करेंगे? तो मुझे यकीन है कि आप में से हर कोई कहेगा, ‘‘हम आपकी पार्टी छोड़ेंगे नहीं।’’ (तालियां) इतना साहस आपमें आया है।
कई लोग मुझसे पूछते हैं कि आप भाषण क्यों नहीं देते? संदेश क्यों नहीं देते? मैं भाषण नहीं देता, संदेश नहीं देता इसका मतलब यह नहीं कि मुझे आपकी चिंता नहीं, आपके लिए मेरे मन में रोष है या कि मैं आपके भले के बारे में सोचता नहीं। स्थिति भांप कर काम करना पड़ता है। दोस्त कौन है? दुश्मन कौन है? ऐसे समय क्या करना चाहिए? जैसी बातों पर गौर करना चाहिए। ऐसे हालात में चुप बैठ कर सोचते रहने के अलावा अन्य कोई चारा नहीं।
पिछले चुनाव में हमारी हार हुई। लेकिन एक साल बाद हुए म्युनिसिपल चुनावों में हमने जीत हासिल की है। 8-10 सीटें हम पा सके। हमारे उम्मीदवारों को मिले वोटों की संख्या इतनी अधिक है कि उनकी बराबरी करने के लिए चार-चार काँग्रेसी उम्मीदवारों के वोट मिलाने पड़ेंगे। इसीलिए, हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं है। हमारा संख्या बल बहुत बड़ा है। अगर हम संगठित हो जाएं, अपना वोट अगर हम बेचें नहीं, अपने वोट का अगर गलत इस्तेमाल नहीं किया, सही वजह के लिए ही उनका अगर इस्तेमाल किया तो हमें किसी से डरने की कोई जरुरत नहीं है।
अगले चुनावों में क्या करना है इस बारे में आज सोचने की जरूरत नहीं है। कौन-से दल चुनावों में उतरते हैं पहले यह देखना होगा। हम अल्पसंख्यक हैं इसलिए किसी न किसी दल का हमें सहयोग देना पड़ेगा। हर दल के कार्यक्रम क्या हैं उनका यह दख कर इस मामले में निर्णय लेना होगा। किसी दल के साथ अगर हाथ मिलाना है तो अपना दल तोड़कर उसमें शामिल होने की जरूरत नहीं। अपने पक्ष को साबुत रख कर ही किसी और पक्ष के साथ हाथ मिलाने की हमें सोचनी होगी। यही हमारी नीति होनी चाहिए।
ब्राह्मणेतर पक्षों का जो हाल हुआ है वही हमारा न हो इसलिए यह संकेत देना मेरे लिए जरूरी हो गया है। अपना संगठन तोड़ कर ब्राह्मणेतर दल काँग्रेस में शामिल हुआ, फिर उन्होंने काँग्रेस छोड़ी और अपना संगठन खड़ा करने लगे। किसी और के घर में घुसने, फिर बाहर निकलने और टूटे हुए घर की मरम्मत करने जैसी नीति हमें नहीं अपनानी है।
सुना है कि फेडरेशन के चुनाव होने जा रहे हैं। ठीक है। चुनावों से मेरी कभी कोई दुश्मनी नहीं रही। एक ही व्यक्ति किसी अधिकार की जगह हमेशा रहे यह भी अच्छा नहीं।