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दूसरे की हवेली में घुसना बड़ी मूर्खता है,

अपनी कुटिया की रक्षा करें

16 जनवरी, 1949 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और उपासिका माईसाहब अम्बेडकर के स्वागत में सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया था।

सभा का आयोजन अचानक किए जाने से कई लोगों को सूचना देर से मिली। इसके बावजूद औरंगाबाद, अहमदनगर, नासिक और मुंबई से आए हजारों लोगों ने सभा में हिस्सा लिया। शनिवार की दोपहर से ही हर रेल लोगों से भर-भर कर आ रही थी। स्टेशन और सराय के अहाते में अपार अस्पृश्य जनसमुदाय इकठ्ठा हुआ था। उनके कारण इस सभा को एक बड़े मेले का स्वरूप प्राप्त हुआ था। हर ट्रेन जब स्टेशन में आती तब पूरा माहौल ‘‘जय भीम’’ के नारे से गूंज उठता। हर कोई दूसरे को ‘‘जय भीम’’ की सलामी देकर स्वागत कर रहा था। पूरे मनमाड़ में लोग छाती पर डॉ. बाबासाहेब की फोटो लगा कर घूम रहे थे।

रविवार के दिन ठीक 11 बजे पंजाब मेल स्टेशन पर आई तब ‘डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की जय’, ‘बोलो रे बोलो जयभीम’, ‘शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन की जय हो’, ‘तरुण पार्टी जिंदाबाद, थोडे दिन में भीमराज’ आदि नारों से पूरा मनमाड़ गूंज उठा। डॉ. बाबासाहेब के दर्शन पाने के लिए उनके सेलून कंपार्टमेंट के दोनों तरफ महिलाओं और पुरुषों की भीड़ जुटने लगी। इतनी भीड़ हुई कि डॉ. बाबासाहेब बाहर नहीं आ पाए। आखिर सबको दर्शन मिले, इसलिए सेलून की दोनों तरफ की खिड़कियां खोल दी गईं। केवल दर्शन पाने के भूखे हजारों लोग अतृप्त नयनों से जहां से भी संभव हो उनके दर्शन कर धन्यभाग हो रहे थे। अस्पृश्यों के अपने नेता के प्रति इतना प्रेम देख कर स्पृश्य वर्ग के लोग अचंभित रह गए। उनमें से एक ने तो मुझे कह सुनाया कि पूरे भारत में अपने नेता से इस तरह प्रेम करने वाला अस्पृश्य समाज और उनके नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जैसा कोई और नहीं। भारत के अन्य सभी नेता निश्चित तौर पर मन में डॉ. बाबासाहेब से जलते होंगे।

सभामंडप रंगबिरंगी पताकाओं से सजा हुआ था। ‘आयुष्यमती सवितादेवी द्वार’, ‘मातोश्री रमाबाई द्वार’ के नाम से दो प्रवेश द्वार बनाए गए थे। पंडाल के आगे की तरफ बीचों-बीच गौतम बुद्ध की प्रतिमा थी। ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’ लिवी पताकाएं सजी थीं।

जनताः 22 जनवरी, 1949