257 16-1-1949 औरों की हवेली में घुसना बड़ी मूर्खता है, अपनी कुटिया की रक्षा करें - मुंबई - Page 139

120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उच्च वर्ग नीचे आए और समाज का दलित उच्च स्थान पर आए, इसके बगैर सच्ची क्रांति होना संभव नहीं। (तालियां) क्रांति का पहिया अब तक केवल आधा ही घूमा है। धुरी के साथ यह पहिया जब तक पूरा नहीं घूमता तब तक जो भी होगा वह सही मायने में क्रांति नहीं हो सकती और, वह पहिया हम ही घुमाएंगे।

फिलहाल मैं राजनीति के बंधन में हूं। 1950 में या उससे पहले ही यह बंधन टूटेगा। चुनाव करीब हैं। उस वक्त मैं आपको पूरी बातें बताऊंगा। अपने समाज के लिए मैंने सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रबंध कर रखा है। लेकिन उन आरक्षित पदों के लिए लायक उम्मीदवार नहीं मिलते। जो राजनीतिक अधिकार पाए हैं उन पर अमल नहीं हो पाता क्योंकि वहां अधिकारी उच्च वर्ण के होते हैं। इसीलिए, अधिकार की उन जगहों पर हमें कब्जा कर लेना चाहिए।

राजनीति की ही तरह शिक्षा संस्था का भी महत्व है। किसी समाज की उन्नति उस समाज के बुद्धिमान, कुछ कर गुजरने का माद्दा रखने वाले और उत्साही युवकों के हाथ होती है। इसी दिशा में सोचते हुए पिछले कुछ वर्षों से मैं राजनीति की तरफ थोड़ा कम ध्यान देकर शैक्षिक संस्थाओं की ओर ज्यादा ध्यान दे रहा हूं। मुंबई में सिद्धार्थ कॉलेज शुरू किया है। सिद्धार्थ कॉलेज में फिलहाल 2400 छात्र पढ़ रहे हैं। उनमें से 160 छात्र हमारे हैं। उन पर हर साल मैं 21000 रुपए खर्च करता हूं। मेरा पूरा ध्यान इसी बात पर है। औरंगाबाद जाकर वहां कॉलेज खोलने के बारे में सोच रहा हूं। यह सब ’’नामदेव की शादी पाडुरंग ने की’’ जैसा ही है।

संविधान समिति ने भविष्यकालीन संविधान का मसौदा तैयार किया है और उसमें अस्पृश्यों के लिए आरक्षण का प्रबंध है। नए संविधान की 9वीं धारा में अस्पृश्यता का खात्मा किया गया है। किसी भी तरह का जातिभेद, ऊंच-नीच की भावना को रद्द कर दिया है। नाई को आपके बाल काटने होंगे, धोबी को आपके कपड़े धोने होंगे, मंदिर, उपहारगृह, और ढाबों पर आपके साथ उच्चवर्णियों की तरह सबको व्यवहार करना होगा। सब लोग आपके साथ समानता का व्यवहार करें। इस कानून को तोड़ने वालों को उसे सजा देने का अधिकार केंद्रीय विधिमंडल को दिया गया है। इन्हीं बातों की हम लोग कई सालों से मांग कर रहे हैं।

तीन तरह के राजनीतिक हक हम मांगते रहे हैं। पहला, हमारे प्रतिनिधियों को विधिमंडल में शामिल किया जाए। दूसरा, जनसंख्या के अनुपात में सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले, तीसरा, अलग चुनाव क्षेत्र मिले। इनमें से केवल एक बात नहीं हो पाई - हमें अलग चुनाव क्षेत्र नहीं मिले। इससे हमारा भाग्योदय खंडित होगा ऐसा मैं नहीं मानता। जो भी मिलता है उसे लेकर अधिक की मांग करते रहना चाहिए। ‘पहनूंगी तो जरीवाली साड़ी ही पहनूंगी, नहीं तो मैं नंगे बदन रहूंगी’ इस कहावत जैसी मानसिकता नहीं होनी चाहिए। इसमें कैसा पुरुषार्थ है?