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हिंदू परम्परागत धर्म के जर्जर हिस्सों को ठीक करने के अलावा
हिंदू कोड बिल में दूसरा कुछ नहीं
हिंदू पार्लियामेंट के समक्ष नए हिंदू कोड बिल को कानून में रूपांतरित करने के लिए प्रस्तुत करते हुए भारत के कानून मंत्री डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,
आप अगर हिंदू आचार, हिंदू संस्कृति और हिंदू समाज को हमेशा के लिए बनाए रखना चाहते हों तो उसमें जहां सुधार अथवा संशोधन की आवश्यकता हो वहां सुधार अथवा संशोधन करने से हिचकिचाना नहीं। हिंदू परम्परागत धर्म का जो हिस्सा बिल्कुल जर्जर हो चुका है उसको ठीक करने के अलावा इस बिल में और कुछ भी नहीं है।
विवाह के बारे में पुरानी सोच और नई सोच वाले लोगों की मर्जी रखने की कोशिश की गई है। पुरानी सोच वाले लोगों को धर्म के अनुसार उनके ही समाज के दुल्हा-दुल्हनों की शादी कराने की इजाजत दी गई है। तो नई सोच वाले लोगों को अपनी विवेक की मानते हुए अपने समाज से बाहर के दुल्हा-दुल्हनों के साथ शादी करने की आजादी दी गई है।
हिंदू समाज का 90 प्रतिशत हिस्सा शूद्रों का है और शूद्रों में विवाहविच्छेद या तलाक देने की रीति बहुत आम है। केवल 10 प्रतिशत हिंदुओं में तलाक लेने की रीति नहीं है। इसलिए मेरा यह सवाल है कि क्या आप 10 प्रतिशत लोगों का कानून 90 प्रतिशत लोगों पर लागू करेंगे? (तालियां)
आप पाएंगे कि लोगों को तलाक का अधिकार हमारे शास्त्रों में भी दिया गया है। वैवाहिक संबंध सुवदायी होने के लिए शासत्रों द्वारा बताए गए नियमों को एक तरफ कर अलग ही रुढि़यों को उनसे श्रेष्ठ स्थान दिया जा रहा है।
दुनिया के जिन लोगों में तलाक बहुत आम बात है उनके अनुभव तलाक का अधिकार देने के लिए अनुकूल ही हैं।
यह सरकार के लिए अथवा इस सदन के लिए बंधनकारी नहीं है कि हर बिल लोगों की राय जानने के लिए प्रसारित किया जाए या उसे प्रकाशित किया जाए। दूसरी बात यह कि, जान-बूझ कर ऐसी व्यवस्था की गई है कि इस बिल का असर केवल प्रांत तक ही सीमित रहे । बात को अगर प्रांत तक ही सीमित रखना हो तो इससे पहले
जनताः 26 फरवरी, 1949, भाषण की तारीख नहीं दी गई है।