262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 154

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राजनीतिक दल स्वयं को देश से बड़े मानने लगें

आजादी तो खतरे में पढ़ जाएगी

26 नवंबर, 1949 के दिन दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्रप्रसाद का कार्यक्रम समापन भाषण होने के बाद भारतीय संविधान पारित हुआ। जिनका जिक्र हमेशा भारतीय संविधान के शिल्पकार के तौर पर किया जाता है जो कि बिल्कुल सार्थक है उन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का उससे एक दिन पहले यानी 25 नवंबर, 1949 के दिन संविधान सभा में आखिरी भाषण हुआ।

संविधान निर्माण के लिए उन्हें कितना परिश्रम करना पड़ा इसका अंदाजा आगे दी गई खबर से लगता है -

‘‘अंदाज है कि 17 तारीख को संविधान समिति का कामकाज स्थगित हो सकता है। संविधान सभा का कामकाज अगर रुक गया तो डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को कुछ दिनों तक पूरी तरह आराम करना पड़ेगा। आराम के लिए माईसाहब के साथ डॉ. बाबासाहेब शायद कश्मीर जाएंगे ऐसा लगता है।’’

संविधान सभा का कामकाज जब चल रहा था तब डॉक्टरसाहब प्रतिदिन 12 से 14 घंटों तक काम किया करते थे। इस साल के आखिर तक यानी 31 दिसंबर, 1949 के आसपास उन्हें संविधान पारित करवाना है। क्योंकि, सभी संकल्प किया है कि नया संविधान 26 जनवरी, 1950 के दिन लागू हो। ख्1,

संविधान निर्माण में उनके योगदान और काम के लिए संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों द्वारा तथा समाचार-पत्र समूहों के इस क्षेत्र के जानकारों द्वारा उनकी खूब प्रशंसा की गई। उनमें से उद्धरण प्रस्तुत हैं ।

आर. के. सिधवा - ‘‘यह संविधान सर्वोत्तम है। लोगों को यह बताना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। मुझे उम्मीद है कि संविधान सभा का हर सदस्य यही कहेगा। हम में भले कितने ही मतभेद हों लेकिन इस संविधान के बारे में हमें गर्व है। हम दुनिया पर इस बात को स्पष्ट करेंगे ताकि दुनिया को पता चले कि यह दस्तावेज संदर्भ के लिए उपयुक्त है। 26 जनवरी, 1950 के ऐतिहासिक दिन हमारा सार्वजनिक जनतंत्र राज्य होगा। मुझे गर्व है कि उस दिन इस संविधान को कानून का स्वरूप प्राप्त होगा।’’ ख्2,

पंडित ठाकुरदास भार्गव - ‘‘मसौदा समिति और उसके सभी सदस्यों के प्रति हमें किस प्रकार कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है। कानून के बारे में कुशाग्र बुद्धि, अथक परिश्रम, अति उच्च प्रकार का कौशल, दृढ़ आत्मविश्वास,

  1. जनताः 17 सितंबर, 1949

  2. Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and Speeches, Vol. 13, PP - 1164 & 65