137
को सुरक्षित रखने के लिए उनके विचार मार्गदर्शन करेंगे।’’ ख्5,
संविधान के मशहूर विशेषज्ञ एस. वी. पायली ने कहा - अपनी विद्वत्ता, कल्पनाशक्ति, तर्कनिश, वाकपटुता और अनुभवों को डॉ. अम्बेडकर ने दांव पर लगाया। बेहद कठिन सवाल पर भी उनका जबरदस्त उत्तर हुआ करता था। वह बड़े ही प्रभावकारी ढंग से और आसानी से अपनी राय सामने रखते। दुनिया के सभी विकसित देशों के संविधानात्मक कानूनों का और उन पर किए गए अमल के बारे में उन्हें अच्छी जानकारी थी। साथ ही 1935 वाले कानून की सूक्ष्मता से जानकारी थी। संविधान के मसौदे के बारे में जब चर्चा हो रही थी तब हर सवाल का वह स्पष्ट तथा प्रभावी और आसान तरीके से जवाब देते थे। उनसे जवाब के बाद सदस्यों के मन का संदेह, उलझन और कठिनाई दूर हो जाती। तर्क आधारित मुक्तियुक्त प्रभावी तथा सब समझ सकें ऐसा स्पष्टीकरण, किसी भी मुद्दे का तुरंत उत्तर देकर मतभेद को खत्म करने की कला केवल उनके ही पास थी किसी और सदस्य के पास नहीं। यह सब करते हुए विरोधियों द्वारा अगर कोई सही मुद्दा पेश किया गया तो उसे जल्द-समझ कर स्वीकारने की उदारता भी उनमें थी। इसीलिए उन्हें आधुनिक मनु या भारतीय संविधान के जनक कहा जाता है, जो सही भी है।’’ ख्6,
बंगाल के विभाजन के कारण वहां से चुने गए कुछ सदस्यों का संविधान सभा की सदस्यता समाप्त हो गयी थी उनमें डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भी शामिल थे। तब तक के उनके कार्य से संविधान सभा को उनकी संविधान विशेषज्ञता और उनके मार्गदर्शन की और उनके सहयोग की बेहद जरुरत महसूस हो रही थी। इस बात का अहसास डॉ. राजेंद्रप्रसाद के मुंबई प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री बी. जी. खेर को 30 जून, 1947 को लिखे वत से होता है। अपने खत में लिखते हैं . ‘अन्य किसी बात के बारे में न भी सोचें तो हमें अब लगने लगा है कि संविधान सभा और जिन विभिन्न समितियों पर डॉ. अम्बेडकर की नियुक्ति हुई उनमें उनका कार्य इतना अमूल्य है कि हम उनके योगदान से वंचित नहीं रहना चाहते। वह बंगाल से चुन कर आए थे। उस प्रांत के विभाजन के बाद उनका संविधान सभा की सदस्यता वत्म हो चुकी थी। संविधान सभा का अगला सत्र दिनांक 14 जुलाई से शुरू हो रहा है और मैं चाहता हूं कि उसमें उनकी सहभागिता हो। इसीलिए, तुरंत उनकी नियुक्ति हो।’’ ख्7, इस प्रकार जुलाई 1947 में मुंबई प्रांत से डॉ. अम्बेडकर को दोबारा संविधान सभा के लिए चुना गया।
उनकी नियुक्ति कितनी सार्थक थी इसका पता संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्रप्रसाद द्वारा 26 नवंबर, 1949 को संविधान पारित करते हुए दिए भाषण में डॉ. अम्बेडकर के प्रति व्यक्त भावनाओं से चलता है। डॉ. राजेंद्रप्रसाद कहते हैं- इस कुर्सी पर बैठ कर
फुले-अम्बेडकर संशोधनातील प्रदुषणे, वसंत मून, पृष्ठ 21 और 24
तत्रैव, पृ. 29
Dr. Babasaheb Ambedkar : Writings and Speeches, Vol. 13, PP 25-26