140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शुरु हुआ और 9 जुलाई, 1900 में उनके संविधान को कानून का स्वरूप मिला। इसके लिए उन्हें 9 वर्ष का समय लगा। दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माण के काम की शुरुआत अक्तूबर, 1908 में हुई और 20 सितंबर, 1909 में उनके संविधान को कानून का स्वरुप प्राप्त हुआ। एक साल के परिश्रम से उन्होंने यह काम पूरा किया। यह बात सही है कि अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका की संविधान समितियों द्वारा लिए गए समय से हमने अधिक समय लिया। लेकिन कनाडा की संविधान सभा से हमने अधिक समय नहीं लिया और ऑस्ट्रेलिया की संविधान सभा की तुलना में हमने बहुत ही कम समय लिया। किसने कितना समय लिया इस बारे में सोचते समय दो बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। पहली बात यह कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया इन देशों के संविधान हमारे देश के संविधान से बहुत छोटे हैं। जैसा कि मैंने बताया कि हमारे संविधान में 395 अनुच्छेद हैं। अमेरिकी संविधान में केवल 7 अनुच्छेद हैं। उनमें से पहले 4 अनुच्छेदों को 21 उपविभागों में विभाजित किया गया है। कनाडा के संविधान में 147, ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और दक्षिण आफ्रिका के संविधान में 153 अनुच्छेद हैं। एक और बात पर ध्यान दिया जाना जरूरी है कि इन चारों देशों के संविधान निर्माताओं को संविधान सुधार के सवालों का सामना नहीं करना पड़ा था। जिस स्वरूप में प्रस्तुति की गईं उसी रूप में उन्हें स्वीकृति मिली। दूसरी तरफ हमारी संविधान सभा को 2473 सुधारों पर विचार करना पड़ा। इस वास्तविकता को ध्यान में रखें तो देरी का आरोप मुझे निराधार है। इतने कम समय में इतना कठिन कार्य पूरा करने के लिए समिति खुद का अभिनंदन करे तो उसमें कुछ गलत नहीं कहा जा सकता।
मसौदा समिति के कार्य की ओर देखते हुए ऐसा लगता है। आयु. नजीरुद्दीन अहमद को उसे पूरी तरह नकारना उनका कर्तव्य है उनकी राय में, मसौदा समिति का काम न केवल नकारने योग्य है बल्कि उससे भी हीन स्तर का है। मसौदा समिति द्वारा किए गए कार्य के बारे में अपनी राय प्रकट करने का अधिकार हर किसी को है। नजीरुद्दीन को भी है। मसौदा समिति के किसी भी सदस्य से अधिक बुद्धिमान होने का नजीरुद्दीन को भरोसा है। मसौदा समिति उनके इस दावे को चुनौती नहीं देना चाहती। बल्कि, संविधान सभा को वह मसौदा समिति पर नियुक्त होने लायक हैं ऐसा ही लगता है। इसलिए उनका हमारे बीच स्वागत करने में मसौदा समिति को खुशी ही होती। संविधान निर्माण के कार्य में उन्हें योगदान का अवसर अगर नहीं मिला तो निश्चित रूप से संविधान समिति का कोई दोष नहीं।
मसौदा समिति पर अपना गुस्सा प्रकट करने के लिए नजीरुद्दीन अहमद ने उसे एक नया नाम दिया है। वह मसौदा समिति को भ्रमण करने वाली समिति कहते हैं। व्यंग्य कसने में नजीरुद्दीन को निश्चित रूप से खुशी मिलती होगी इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन उन्हें एक बात के बारे में स्पष्ट जानकारी शायद नहीं है कि अनियंत्रण के कारण बहते जाना और बहते हुए पर नियंत्रण रखने में फर्क होता है। परिस्थितियों पर नियंत्रण