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था, इसलिए मसौदा समिति कभी बह नहीं गई। जहां मछली जाल में नहीं फंसने वाली थी वहीं जाल बिछा कर वे बैठी नहीं रही। जो मछली वह पकड़ना चाहती थी, वह जहां मिलने की संभावना थी वहीं उसने अपना जाल बिछाया था। बेहतर कुछ पाने की कोशिश करना इसका मतलब भटकना नहीं होता। यह कह कर नजीरुद्दीन संविधान समिति का अभिनंदन नहीं करना चाहते यह मैं जानता हूं फिर भी मैं, उन्होंने जो भी कुछ कहा है उसे समिति के अभिनंदन के रूप में ही स्वीकार करता हूं। दोषपूर्ण सुधारों को परे कर अगर योग्य सुधारों को स्वीकारने की ईमानदारी और साहस मसौदा समिति नहीं दिखाती तो ही वह अपने कर्तव्य से हट जाती और प्रति की झूठी बातों की बलि चढ़ने की दोषी कहलाती। यह अगर गलत है तो उस गलती को बेझिझक मान कर उनमें सुधार लाने के लिए मसौदा समिति ने कोशिश की इसमें मुझे खुशी है।
एक सदस्य के अपवाद को अगर छोड़ दें तो संविधान सभा के सदस्यों द्वारा मसौदा समिति द्वारा किए गए काम की भरपूर प्रशंसा की है इसकी मुझे खुशी है। मसौदा समिति द्वारा जो परिश्रम किए गए उनका उत्स्फूर्तता से स्वीकार कर खुले दिल से प्रशंसा किए जाने से मसौदा समिति को खुशी होगी इसका मुझे भरोसा है। संविधान सभा के सदस्य और मसौदा समिति के मेरे सहयोगियों ने मुझ पर अभिनंदन की जो वर्षा की है उससे मैं इतना ग०द् हुआ हूं कि उनके प्रति अपनी कृतज्ञता को पूरी तरह व्यक्त करने के लिए मेरे पास यथा योग्य शब्द नहीं बचे हैं। संविधान सभा में आते हुए आरक्षित जातियों के हितों की रक्षा करने के अलावा मेरी कोई बड़ी आकांक्षा नहीं थी। इससे बड़ी जिम्मेदारी के काम के लिए मुझे आमंत्रित किया जाएगा इसका मुझे थोड़ा भी अहसास नहीं था। मसौदा समिति में मुझे चुना गया तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मसौदा समिति के अध्यक्ष पद के लिए जब मुझे चुना गया तब तो मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना ही नहीं रहा। मसौदा समिति में मेरे मित्र सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर जैसे मुझसे बडे, अच्छे और योग्य व्यक्ति थे। इतना भरोसा कर, मुझ पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंप कर उन्होंने मेरा चयन किया और देश सेवा का मुझे मौका दिया इसके लिए मैं संविधान सभा और मसौदा समिति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं। (हर्षध्वनि)
मुझे इस काम का श्रेय दिया जा रहा है लेकिन यह केवल मेरा काम नहीं है। संविधान सभा के सलाहकार सर. बी. एन. राव का भी इसमें आंशिक योगदान है जिन्होंने मसौदा समिति के विचारार्थ संविधान का कच्चा मसौदा तैयार किया। मसौदा समिति के अन्य सदस्यों का भी इसमें हिस्सा है। जैसा कि मैंने बताया, 141 दिनों तक इस समिति ने काम किया। नए सूत्र ढूंढ निकालने की इस समिति की कल्पनाशीलता और कई मुद्दों को अपने विचारों में समाहित करने की सहनशीलता के बगैर संविधान निर्माण का यह कठिन काम सफलता के साथ पूरा नहीं हो पाता। इसके श्रेय का बड़ा हिस्सा संविधान का ढांचा बनाने वाले प्रमुख आयु. एस एन मुखर्जी का भी है। जटिल प्रस्तावों को आसान और सुस्पष्ट कानूनी स्वरूप में परिवर्तित करने की तथा इसके लिए कठोर परिश्रम करने की उनकी