262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 162

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आपको धन्यवाद देना है।

संविधान का जितना समर्थन करना था उतना मेरे मित्र सर अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर और आयु. टी. टी. कृष्णमाचारी ने किया है। इसलिए संविधान की गुणवत्ता के मसले पर मैं बोलना नहीं चाहता। मेरी राय में संविधान भले कितना भी बुरा हो उसे लागू करने की जिम्मेदारी जिन पर है वे अगर ईमानदार हों तो वे अच्छे ही साबित होंगे। इसी प्रकार संविधान भले कितना भी बुरा क्यों न हो उसे लागू करने की जिम्मेदारी जिन पर है वे अगर ईमानदार हों तो वह अच्छा ही साबित होगा। संविधान पर अमल करना पूरी तरह से संविधान पर ही निर्भर नहीं करता। संविधान केवल राज्य के कुछ हिस्सों को - जैसे कि कानून मंडल, कार्यकारी मंडल और न्यायपालिका बनाता है। इन विभागों का कार्य हमेशा लोगों पर तथा अपनी आकांक्षाएं तथा साधनों के रूप में लोगों द्वारा निर्माण की गई राजनीतिक पार्टियों पर निर्भर रहने वाला है। भारत के लोग और उनके राजनीतिक दल कब किस प्रकार पेश आएंगे यह कोई कैसे बताए? अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के संवैधानिक मार्ग को अपनाएंगे या फिर क्रांतिकारी मार्ग को अपनाएंगे? अगर वे क्रांतिकारी मार्ग को अपनाएंगे तो भले संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो वे असफल रहेंगे यह बताने के लिए किसी विधिवेता की जरूरत नहीं। इसीलिए भारतीय लोग और उनके राजनीतिक दल कैसे पेश आएंगे यह जाने बगैर संविधान के बारे में कोई भी निर्णय लेना निरर्थक होगा।

साम्यवादी और समाजवादी दल की ओर से संविधान के बारे में बड़े पैमाने पर नाराजगी जताई जा रही है। वे संविधान के प्रति क्यों नाराजगी जाहिर करते हैं? सचमुच संविधान ठीक नहीं है इसलिए क्या वे अपनी नाराजगी व्यक्त करते हैं? इस सवाल के जवाब में मैं निश्चित रूप से ना ही कहूंगा। साम्यवादी पार्टी को कामगारों पर तानाशाही के सिद्धांतों पर आधारित संविधान चाहिए। प्रस्तुत संविधान संसदीय जनतंत्र पर आधारित होने के कारण वे संविधान का विरोध करते हैं। समाजवादी दो बातें चाहते हैं - पहली बात कि, अगर सत्ता उनके हाथ में आती है तो वे बिना उसकी कीमत चुकाए निजी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण अथवा सामाजीकरण करने की आजादी उन्हें संविधान के तहत मिलनी ही चाहिए। समाजवादी जो एक और चीज चाहते है वह है संविधान के मौलिक अधिकार निरपेक्ष तथा किसी भी तरह के बाधारहित होने चाहिए। उनके पक्ष को अगर सत्ता प्राप्त करने में असफलता मिली तो बेरोकटोक टीका-टिप्पणी करने की ही नहीं वरन् राज्य को नेस्तनाबूत करने की आजादी भी उन्हें चाहिए।

मुख्य रूप से इन दोनों मांगों के कारण ही संविधान पर टिप्पणी के बाण चलाए जा रहे हैं। संसदीय जनतंत्र के सिद्धांत ही केवल राजनीतिक जनतंत्र का आदर्श रुप हैं ऐसा मैं नहीं मानता। मैं ऐसा नहीं कह सकता कि मोल चुकाए बिना किसी की निजी संपत्ति को अपने कब्जे में करने का सिद्धांत इतना पवित्र है कि उससे अलग नहीं हुआ जा सकता। मौलिक अधिकार कभी भी अबाध नहीं हो सकते, और मैं यह भी नहीं कहता