144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कि उन पर डाले गए प्रतिबंध कभी हटाए ही नहीं जा सकते। मैं बस इतना बताना चाहता हूं कि संविधान में शामिल राय आज की पीढ़ी की राय है। आपको यह कथन अगर अत्युक्तिपूर्ण लगता है तो मैं यह कहूंगा कि ये संविधान सभा के सदस्यों की राय है। संविधान में उन्हें शामिल करने को लेकर मसौदा समिति को दोष नहीं दिया जाना चाहिए। वैसे, मैं कहूं कि संविधान सभा पर भी इसका दोषारोपण क्यों हो? अमेरिका के संविधान निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अमेरिकी कूटनीतिज्ञ जेफरसन् ने कुछ अति महत्वपूर्ण और तथ्यपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। संविधान निर्माताओं को उनके विचारों को हमेशा याद रखना चाहिए। एक जगह वह कहते हैं कि,
‘‘हर पीढ़ी बहुसंख्यकों की इच्छा के अनुसार खुद को बांध लेने का अधिकार प्राप्त आजाद राष्ट्र की तरह है। अन्य राष्ट्र के लोगों की तरह ही आने वाली पीढ़ी को कोई बंधक नहीं बना सकता।’’
एक और जगह वह कहते हैं,
‘‘देश हित के लिए स्थापन की गई संस्थाओं को छुआ नहीं जा सकता अथवा उनमें फेरबदलाव नहीं किए जा सकता। उनके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि लोगों के हित की जिम्मेदारी जिन पर सौंपी गई है उन्हें कुछ अधिकार भी बहाल किए गए हैं। शायद सत्ता का दुरुपयोग करने वाली राजसत्ता के विलाफ यह असरदार प्रावधान हो सकता है। लेकिन यह कल्पना राष्ट्र के दृष्टिकोण से बेहद नासमझी है। इसके बावजूद हमारे कानूनविद और धर्मगुरु इसी सिद्धांत को सामान्यतया लागू करने की कोशिश करते हैं। वो सोचते हैं कि हमसे पहली पीढ़ी इस धरती पर अधिक आजादी के साथ रहा करती थी। हम जिसे बदल नहीं पाएंगे ऐसे अपरिवर्तनीय कानून हम पर लादने के अधिकार उनके पास थे। इसी प्रकार भावी पीढ़ी जिसे बदल न पाए ऐसे कानून हमने बनाए और लोगों पर लादे तो यह दुनिया केवल मृतकों की होगी, जिंदा लोगों की नहीं होगी।’’
मैं मानता हूं कि जेफरसन ने जो बताया है वह सत्य है। इस बारे में दो राय नहीं हो सकती। जेफरसन के बताए सत्य की ओर अगर संविधान सभा नजरंदाजी करती तो उस पर दोषारोपण किया जा सकता था। उसका विरोध भी किया जा सकता था। लेकिन क्या सचमुच ऐसा हुआ है? वास्तविकता इसके बिल्कुल खिलाफ है। संविधान में सुधार के प्रावधान का ही उदाहरण लीजिए। कनाडा के संविधान में सुधार करने का अधिकार वहां के लोगों को नकारा गया है लेकिन हमारे संविधान ने उनकी तरह अंतिम और अचूक होने का दावा नहीं किया है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की तरह संविधान में सुधार के लिए असाधारण शर्तें भी नहीं रखी गई हैं। उल्टे संविधान सभा ने हमारे संविधान में सुधार के लिए बेहद सुलभ तरीकों का प्रावधान रखा है। संविधान की समीक्षा करने वाले किसी भी समीक्षक को मैं चुनौती देता हूं कि वे दिखा दें कि अपनी जैसी स्थिति वाले संसार के किसी भी देश की संविधान सभा द्वारा सुधार के लिए इस तरह का प्रावधान किया गया हो। संविधान के प्रति