262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 164

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असंतुष्ट लोगों को केवल 2/3 का बहुमत ही प्राप्त करना होगा। वयस्क मतदान पद्धति से चुनी गई संसद में उनकी तरफ से वे 2/3 का बहुमत भी अगर प्राप्त नहीं कर सकें तो संविधान के प्रति उनके असंतोष को आम जनता का असंतोष नहीं माना जा सकता।

संविधान से संबंधित एक महत्वपूर्ण विषय के बारे में अब मैं कहना चाहता हूं। सत्ता का जरूरत से अधिक केंद्रीकरण किया गया है और प्रांतों को नगरपालिका के स्तर पर लाया गया है इस प्रकार की एक गंभीर शिकायत भी की जाती है। स्पष्ट है कि यह नजरिया न केवल अत्युक्तिपूर्ण है, बल्कि संविधान के जरिए क्या करवाना है इस बारे में जानकारी के अभाव को भी दर्शाता है। केंद्र और राज्य के बीच का संबंध जानने के लिए जिन मूलभूत सिद्धांतों पर वे आधारित होते हैं उन्हें समझना जरूरी है। संघ राज्य का मूलभूत सिद्धांत यह है कि विधानसभा और कार्यकारी मंडल की सत्ता का केंद्र और राज्य के बीच का बंटवारा केंद्र के किसी कानून के तहत नहीं वरन् संविधान द्वारा ही किया गया है।

संविधान का यही काम है। संविधान के तहत होने वाले राज्य अपने विधि संबंधी अथवा कार्यकारी अधिकारों के लिए किसी भी प्रकार केंद्र पर निर्भर नहीं हैं। इस मामले में केंद्र और राज्य समान स्तर पर हैं। ऐसे संविधान को केंद्रीभूत कहा जाए यह बात समझना थोड़ा मुश्किल है। यह भी हो सकता है कि अन्य किसी भी संघराज्य के संविधान में जितना नहीं दिया गया है उतना विधानसभा और कार्यकारी मंडल का व्यापक क्षेत्र संविधान द्वारा केंद्र को दिया गया है। ऐसा भी हो सकता है कि शेष अधिकार राज्यों को न देकर केंद्र को दिए गए हों। लेकिन ये विशिष्टताएं संघराज्य के मूलतत्व नहीं हैं। जैसा कि मैंने बताया था, संघराज्य की मूल पहचान है केंद्र और घटकों के बीच विधानसभा और कार्यकारी मंडल की सत्ता का संविधान द्वारा किया गया विभाजन है। यह तत्व हमारे संविधान में अंतर्निहित है। इस बारे में कोई गलती हो ही नहीं सकती। यह कहना गलत होगा कि इसीलिए राज्यों को केंद्र के अधिकार में रखा गया है। विभाजन की यह मर्यादाएं केंद्र अपनी इच्छानुसार नहीं बदल सकता। यह अधिकार न्यायपालिका के पास भी नहीं है। इस बारे में यह बिल्कुल योग्य कहा गया है कि -

‘‘न्यायालय सुधार ला सकते हैं लेकिन एक को हटा कर उसकी जगह दूसरा कानून नहीं बना सकते। पुराने अन्वयार्थ में बदलाव करते हुए वे नया युक्तिवाद कर सकते हैं, नया नजरिया सामने रख सकते हैं। अल्पमत से दिए गए निर्णयों को बदल सकते हैं लेकिन सीमा-रेखाएं ऐसी हैं जिन्हें वे पार नहीं कर पाएं। अधिकार के निश्चित बंटवारे में अब वे नए सिरे से फेरबदलाव नहीं ला सकते। जो अधिकार अस्तित्व में हैं उनकी व्यापकता वे बढ़ा सकते हैं। लेकिन एक सत्ता को दिया अधिकार निःसंशय दूसरे को नहीं दिया जा सकता।’’

इस प्रकार संघ पद्धति को हराने वाला केंद्रीयकरण का यह पहला आरोप निराधार सिद्ध होता है।

दूसरा आरोप यह कि, राज्यों को परास्त करने का अधिकार केंद्र को दिया गया है।