262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 165

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस आरोप को मानना ही पड़ेगा। लेकिन इस प्रकार मात देने का अधिकार संविधान की साधारण विशिष्टताओं का हिस्सा नहीं है। उनका प्रयोग और उन पर किए जाने वाले अमल को केवल आपातकाल तक ही सीमित रखा गया है। ध्यान रवने योग्य एक और बात यह है कि आपातकाल आने के बाद हम केंद्र को अधिकार देना क्या टाल सकते हैं? आपातकाल के दौरान भी केंद्र के पास विजय पाने के अधिकार होने की बात जिन्हें मंजूर नहीं है उन्हें लगता है, समस्या के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘द राउंड टेबल’ के दिसंबर 1935 के अंक में इस समस्या को एक लेखक ने बहुत सफाई से स्पश् किया है। उसमें से कुछ हिस्सा यहां उद्धृत कर रहा हूं-

‘‘अधिकार और कर्तव्य की आपसी उलझन राजनीतिक व्यवस्था है और अंततः नागरिक किसकी और किस सत्ता के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करें इस बात से ताल्लाक रखती है। सामान्य हालात में यह समस्या पैदा नहीं होती। कानून पर आसानी से अमल किया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग सत्ताओं का आदेश मान कर मनुष्य अपना व्यवहार करता रहता है। संकट के समय किसका आदेश माना जाए इस बात को लेकर संघर्ष पैदा हो सकता है। और स्पस्ट है कि ऐसे समय अंतिम निष्ठा को टूटने नहीं देना चाहिए। निष्ठा के बारे में अंतिम निर्णय कानून के न्यायालयीन अर्थ के सहारे नहीं लिया जा सकता। कानून को वस्तुस्थिति के साथ मेल खाने वाला होना चाहिए वरना वह बिल्कुल प्रभावहीन होगा। जब सारे शिष्टाचार एक तरफ कर रखे जाते हैं उस वक्त एक सवाल रह जाता है कि नागरिकों की शेष निष्ठा पर किसकी सत्ता हो? केंद्र की अथवा घटक राज्यों की?’’

इस सवाल का जवाब कौन और किस प्रकार देता है इस पर इस समस्या का हल निर्भर करता है और यही सवाल महत्वपूर्ण है। आपातकाल के दौरान नागरिकों की शेष निष्ठा घटक राज्यों के साथ नहीं बल्कि केंद्र के साथ होनी चाहिए। ज्यादातर लोगों की यही राय होती है। इसमें कोई दो राय नहीं। क्योंकि मिली-जुली उद्देश्यपूर्ति के लिए और देश के कुल हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ही कार्य करती है। इसी कारण आपातकाल में केंद्र सरकार को अधिक अधिकार देने का समर्थन निहित होता है। आखिर आपातकालीन अधिकार केंद्र को देने में राज्यों पर क्या उत्तरदायित्व आता है? इतना ही फेरबदलाव आता है कि आपातकाल में अपने हितों की रक्षा के साथ-साथ राज्यों को कुल राष्ट की राय और राष्ट्र के हितों का ध्यान रखना होता है। जो इस व्यवस्था को ठीक से समझ नहीं पाए हैं वही इसके खिलाफ शिकायत करेंगे।

यहां मैंने अपना भाषण पूरा किया होता, लेकिन मेरा मन देश के भविष्य को लेकर इतना चिंतित है कि इस बारे में मेरी राय व्यक्त करने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल किया जाए ऐसा मुझे लगता है। 26 जनवरी, 1950 के दिन भारत एक आजाद देश बनेगा। (हर्षो८ास की ध्वनि) फिर उस आजादी का क्या होगा? भारत अपनी आजादी को बरकरार रखेगा या फिर से गंवा देगा? मेरे मन में यही विचार पहले आता है। भारत