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पहले कभी आजाद नहीं था ऐसी बात नहीं है। लेकिन एक बार उसने अपनी आजादी गंवाई है, क्या एक बार फिर वह अपनी आजादी गंवा बैठेगा? भविष्य के बारे में यही सवाल मुझे बहुत ज्यादा चिंता में डालता है। भूतकाल में भारत ने केवल अपनी आजादी गंवाई थी ऐसी बात नहीं है। देश के ही कुछ विश्वासघात करने वाले और बेईमान लोगों के कारण भारत ने अपनी आजादी गंवाई थी यह वास्तविकता मुझे बेहद बेचैन करती है। मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध प्रांत पर हमला किया उस वक्त दस राज्यों के सैनिक अधिकारियों ने मुहम्मद बिन कासिम के दूतों से घूस ली और अपने राज्य के लिए लड़ने से इनकार किया। मुहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने का आमंत्रण जयचंद ने दिया था। पृथ्वीराज के खिलाफ लड़ने के लिए उसने मुहम्मद गौरी को अपने और सोलंकी राजाओं की मदद का आश्वासन दिया था। शिवाजी जब हिंदुओं की मुक्ति के लिए लड़ रहा था उस वक्त अन्य मराठा सरदार और राजपूत राजा मुगल सम्राटों की ओर से युद्ध लड़ रहे थे। सिक्ख राज्यकर्ताओं को हराने की कोशिश जब अंग्रेज शासक कर रहे थे तब उनका प्रमुख सेनापति गुलाबसिंग चुप बैठा रहा। सिक्खों का राज्य बचाने के लिए उसने सिक्खों की मदद नहीं की। 1857 को भारत के ज्यादातर हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता युद्ध की घोषणा की तब सिक्ख दर्शक बन कर बस देवते रहे।
क्या एक बार फिर इतिहास दोहराया जाएगा? इसी खयाल से मैं चिंताग्रस्त हुआ हूं। जातियों और संप्रदायों के रूप में अपने पुराने दुश्मनों के साथ भिन्न और परस्पर-विरोधी विचारप्रणाली वाले राजनीतिक दलों की भी भरमार होने वाली है। इस वास्तविकता के बारे में सोच कर मैं अधिक ही चिंताग्रस्त हुआ हूं। मैं नहीं जानता कि भारत के लोग अपनी सिद्धांत से देश को श्रेष्ठ स्तर पर दखेंगे अथवा अपनी सिद्धांत को देश से बढ़ कर मानेंगे। लेकिन एक बात पक्की है कि अगर पक्ष अपनी तत्वप्रणाली को देश से बढ़कर मानेंगे तो दोबारा आजादी गंवाने का संकट आएगा ही। और इस बार आजादी गंवा बैठे तो वह हमेशा के लिए हाथ से जाएगी। इस संभावना के खिलाफ लड़ने के लिए हमें कटिबद्ध होना है। अपने खून की आखरी बूंद जब तक है तब तक अपनी आजादी की रक्षा का निर्धारण हमें करना ही होगा। (हर्षध्वनि)
26 जनवरी, 1950 को भारत एक जनतांत्रिक देश बनेगा। अर्थात् उस दिन भारत में ऐसी सरकार बनेगी जो लोगों द्वारा बनाई जाएगी, लोगों की होगी, लोगों के लिए काम करेगी। तभी मेरे मन में खयाल आता है कि इस जनतांत्रिक संविधान का क्या होगा? उसे महफूज रखने के लिए यह देश समर्थ रहेगा या एक बार फिर वह अपनी आजादी गंवा बैठेगा? मेरे मन में आने वाला यह दूसरा खयाल भी पहले खयाल की तरह ही मुझे चिंता में डाल देता है।
जनतंत्र क्या होता है यह भारत को पता नहीं था ऐसी बात नहीं है। किसी जमाने में भारत में गणराज्यों की भरमार थी। अगर कहीं नौकरशाही थी तो चुनी हुई या सीमित हुआ करती थी। वे कभी भी अबाध नहीं थीं। भारत को संसद अथवा संसदीय प्रणाली