262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 167

148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के बारे में पता नहीं था ऐसी बात नहीं। बौद्ध भिक्खू संघों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उस वक्त न केवल संसद थी बल्कि संघ भी कुछ और नहीं संसद ही थे। आधुनिक युग में परिचित संसदीय कार्यप्रणाली के सभी नियम संघ को पता थे और वे उनका पालन करते थे। बैठने की व्यवस्था, विधेयक प्रस्तुत करने के नियम, प्रस्ताव, कामकाज के लिए जरूरी न्यूनतम सदस्य संख्या, दल के नेता द्वारा आदेश देना, मतों की गिनती, मतपत्रिका के द्वारा मतदान करना, कटौती की सूचना, नियम से काम करना, न्याय व्यवस्था आदि के बारे में उनके पास नियम थे। संसद के काम के ये नियम बुद्ध द्वारा संघ की सभाओं के लिए प्रयोग में लाए गए थे, लेकिन देश में उस दौरान कार्यरत राजनीतिक विधानसभा की नियमावली से ही उन्होंने ये नियम स्वीकारे होंगे।

भारत ने यह जनतांत्रिक पद्धति गंवाई। अब क्या दूसरी बार भी वह उसे गंवाने वाला है? मैं नहीं जानता। लेकिन लंबे समय से जनतंत्र प्रयोग में न होने के कारण उसका बिल्कुल नया लगना भारत जैसे देश में हो सकता है। यहां जनतंत्र द्वारा तानाशाही को स्थान दिए जाने का जोखिम है। नए सिरे से देश में आया जनतंत्र अपना बाह्यरूप बरकरार रखेगा लेकिन असल में वह तानाशाही को ही जन्म देगा। प्रचंड बहुमत हो तो दूसरी संभावना के पैदा होने का जबरदस्त खतरा है।

हम अगर सचमुच चाहते हैं कि केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं वरन् वास्तव में जनतंत्र अस्तित्व में आए तो हमें उसके लिए क्या करना होगा? मेरी राय में जो पहले हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संवैधानिक मार्ग को ही अपनाने की ठान लेनी चाहिए। अर्थात्, क्रांति का खून से सना मार्ग हमें त्यागना होगा। इसका मतलब है कि कानून तोड़ना, असहयोग, सत्याग्रह इन मार्गों को भी हमें दूर रखना होगा। आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जब संवैधानिक मार्ग उपलब्ध नहीं थे तब इन असंवैधानिक मार्गों को अपनाने का बड़े पैमाने पर समर्थन किया जाता था। लेकिन अब संवैधानिक मार्ग उपलब्ध हैं इसलिए इन असंवैधानिक मार्गों का समर्थन नहीं कर सकते। असल में ये मार्ग अराजकता फैलाने की शुरुआत हैं। जितने जल्दी हम उन्हें त्याग देंगे उतना ही हमारे हित में होगा।

एक और महत्वपूर्ण बात है जिस पर हमारा अमल करना बेहद जरूरी है। जनतंत्र के संवर्धन में जिनकी आस्था है उन सबको जॉन स्टुअर्ट मिल की दी हुई चेतावनी को ध्यान में रखना होगा। उनकी राय में, ‘व्यक्ति भले कितना भी महान हो लोगों को अपनी स्वतंत्रता उसके चरणों में अर्पण नहीं करनी चाहिए। साथ ही उस पर इतना विश्वास न करें कि वह प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल लोगों की संस्थाएं ध्वस्त करने के लिए करे।’ अपना पूरा जीवन देश के लिए समर्पित करने वाले महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना गलत नहीं। लेकिन कृतज्ञता की भी कोई सीमाएं होनी चाहिएं। आइरिश देशभक्त डॅनियल ओकॉनेल ने ठीक ही कहा है कि, ‘‘कोई भी व्यक्ति अपने स्वाभिमान की बलि चढा कर कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकता। कोई महिला अपने शील की बलि चढ़ा कर कृतज्ञता व्यक्त नहीं