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कर सकती और कोई भी देश अपनी आजादी की बलि चढ़ा कर कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकता।’’ अन्य देशों की तुलना में भारत को सावधान रहने के इस इशारे पर ज्यादा ध्यान देना होगा। क्योंकि, भारत में भक्ति, भक्ति का मार्ग अथवा विभूतीपूजा अन्य किसी देश की राजनीति की तुलना में सबसे अधिक दिखाई देगी। धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है लेकिन राजनीति में भक्ति अथवा व्यक्तिपूजा अधःपतन और अंततः तानाशाही की ओर ले जाने वाला मार्ग साबित होती है।
तीसरी बात केवल राजनीतिक जनतंत्र पर हमें संतोष नहीं कर लेना चाहिए। अपने राजनीतिक जनतंत्र का हमें सामाजिक जनतंत्र में परिवर्तन करा लेना ही चाहिए। राजनीतिक जनतंत्र की जड़ में अगर सामाजिक जनतंत्र की ताकत न हो तो वह अधिक समय तक टिक नहीं सकता। सामाजिक जनतंत्र क्या है? वह जीने की एक राह है। इसके जरिए स्वतंत्रता, समता और बंधुता को जीवन के सिद्धांत के रूप में मान्यता दी जाती है। स्वतंत्रता, समता और बंधुता को एक त्रयी के स्वतंत्र अंगों के रूप में नहीं सोचा जा सकता। इन तीनों का मिल कर एक संघ बनता है यानी कि, उनमें से किसी एक को अलग करने का मतलब जनतंत्र के मूल उद्देश्य को ही छोड़ देना है। समता से स्वतंत्रता को अलग नहीं किया जा सकता और न ही स्वतंत्रता को समता से अलग किया जा सकता है। इसी प्रकार स्वतंत्रता और समता को बंधुभाव से अलग नहीं किया जा सकता। समता के बिना स्वतंत्रता का मतलब है कि कुछ लोगों का बहुतांश लोगों के ऊपर प्रभुत्व करना। स्वतंत्रता के बगैर समानता निजी कर्तत्व के लिए मारक होगी। बंधुता के बिना स्वतंत्रता और समता अस्तित्व में ही नहीं रहेंगे। उन्हें व्यवहार में ले आने के लिए पुलिस महकमे की जरूरत पड़ेगी। भारतीय समाज में दो बातों का सिरे से अभाव है। इस वास्तविकता को मान कर ही हमें शुरुआत करनी होगी। उनमें से एक है समता। हमारा समाज श्रेणीबद्ध विषमता के सिद्धांत पर आधारित है। अर्थात् समाज में कुछ लोग ऊंचे स्तर के हैं और अन्य लोग निचले स्तर के। आर्थिक क्षेत्र में हमारे समाज में कुछ लोगों के पास बहुत अधिक संपत्ति है तो कई लोग अत्यंत घोर गरीबी में जीते हैं। 26 जनवरी, 1950 के दिन हम एक विसंगतिपूर्ण समाज में प्रवेश करने वाले हैं। राजनीति में हमारे पास समता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में हम हर व्यक्ति का एक वोट और हर वोट का समान मूल्य वाले सिद्धांत को मान्यता देंगे। सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हर व्यक्ति का समान मूल्य वाला सिद्धांत हम नकारते रहेंगे। इस प्रकार के परस्पर विरोधी जीवन में हम और कब तक जिएंगे? आर्थिक और सामाजिक जीवन में हम और कब तक समानता को नकारते रहेंगे? अगर अधिक समय तक हम उसे नकारते रहेंगे तो अपना राजनीतिक जनतंत्र हम खुद संकट में डालेंगे इसमें कोई दो राय नहीं। इस विसंगति को जितनी जल्दी हो सके हमें खत्म कर देना है। अन्यथा जिन्हें विषमता जनित बुरे परिणामों को झेलना पड़ता है वे बहुत परिश्रम से इस सभा द्वारा निर्माण की गई राजनीतिक जनतंत्र की संरचना को नष्ट करेंगे।