262 25-11-1949 राजनीतिक दल अपने तत्वों को देश से बड़े मानने लगें तो आजादी खतरे में आएगी - नई दिल्ली - Page 169

150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हममें जो कमियां हैं, उनमें दूसरी है - बंधुत्व के तत्व को मानना। बंधुत्व यानी क्या? भारतीय लोग अगर एक हैं तो सभी भारतीयों में बंधुत्व का भाव समान रूप में होना है। सामाजिक जीवन में इससे एकता और सामंजस्य आता है। लेकिन इसे हासिल करना मुश्किल है। कितना मुश्किल है यह इस कहानी से पता चलता है जो अमेरिका के बारे में जेम्स ब्राइस ने अपने लिखे अमेरिकी कॉमनवेल्थ खंड में बताई है। मैं इस कहानी को ब्राइस के ही शब्दों में सुनाना चाहूंगा-

‘‘कुछ वर्ष पूर्व अमेरिकन प्रोटेस्टंट एपिस्कोपल चर्च के त्रिवार्षिक अधिवेशन में उनकी सामूहिक प्रार्थना में फेरबदलाव करने का प्रसंग आया। प्रार्थना के वाक्यों को छोटा करने और सभी लोगों के लिए होने वाली प्रार्थना को उसमें मिलाना ठीक रहेगा। न्यू इंग्लंड के प्रमुख धर्मोपदेशक ने ये शब्द सुझाए, कि, ‘हे प्रभो हमारे राष्ट्र को आशिर्वाद दें’। उस दिन सभी लोगों द्वारा उत्साह के साथ उन्हें स्वीकार भी किया गया। इसी वाक्य पर दूसरे दिन फिर सोचा गया। धर्मोपदेशकों के अलावा अन्य कई लोगों को राष्ट्र शब्द पर आपत्ति थी। उनका कहना था कि इस शब्द के कारण वास्तव में न होने वाली राष्ट्र की एकता स्पष्ट रूप से सूचित होती है। इसलिए उस शब्द को हटाया गया और ‘हे प्रभो इन संयुक्त राज्यों को आशिर्वाद दे’ शब्दों का प्रयोग किया गया।’’

यह घटना जब घटी तब अमेरिका के लोगों के बीच एकता की भावना की इतनी कमी थी कि उन्हें नहीं लगता था कि उनका एक राष्ट्र है। अमेरिका के लोगों के मन में एक राष्ट की भावना नहीं पनप सकी तो भारतीयों के मन में उसका पनपना कितना कठिन है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मुझे वे दिन याद हैं जब राजनीति के लोगों को ‘भारतीय लोग’ कहने से कितनी कोफत हुआ करती थी। ‘‘भारतीय राष्ट्र’’ कहलाना उन लोगों को पसंद था। मेरी राय में अपना एक राष्ट्र है इस पर विश्वास करना यानी जो अस्तित्व में नहीं है उसके अस्तित्व में होने का भ्रम पालना। हजारों जातियों में बंटी जनता का एक राष्ट्र कैसे बन सकता है? सामाजिक और मानसिक नजरिए से हम अभी भी एक राष्ट्र नहीं हैं इसका अहसास हमें जितने जल्दी होगा उतना हमारे लिए अच्छा होगा। उसके बाद ही हमें एक राष्ट्र होने की जरूरत कितनी महत्वपूर्ण है इसका पता चलेगा। हमारे उद्देश्य की पूर्ति के लिए किन उपायों का और किन मार्गों का अनुसरण करना है इस पर हम गंभीरतापूर्वक सोचने लगेंगे। इस उद्देश्य तक पहुंच पाना भी बहुत कठिन है। अमेरिका के लोगों के लिए जितना मुश्किल था उससे कई गुना मुश्किल है। अमेरिका में जाति की समस्या नहीं है। भारत में जातियां हैं। जातियां राष्ट्रविरोधी हैं। पहली बात, वे सामाजिक जीवन में फूट डालती हैं। जातियां राष्ट्रविरोधी हैं क्योंकि वे जातियों के बीच आपसी तिरस्कार कटुता और द्वेष की भावना निर्माण करती हैं। हमें अगर वास्तव में राष्ट्र बनना है तो इन सभी मुश्किलों से पार पाना होगा। राष्ट्र निर्माण के बाद ही असल में बंधुभाव देखने को मिलेगा। बंधुत्व बिना समता और स्वतंत्रता की बात करना केवल ऊपरी रंग की परत, केवल बाहरी दिखावा होगा।