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हमारे सामने अब जो मुश्किल काम हैं उनके बारे में मेरी ये प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ लोगों के लिए आनंददायी नहीं हैं ऐसा लग सकता है। इस देश में राजनीतिक सत्ता केवल मुठ्ठी भर लोगों की बपौती या मिलकियत भर रह गई है। ज्यादातर लोग केवल बोझ ढोने वाले प्राणी ही नहीं वरन् शिकार बन कर रह गए हैं। कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता। इससे वे न केवल विकास के मौकों से बल्कि मानवीय जीवन का महत्व जानने से भी वंचित रहने वाले हैं। इतना उनका अधःपतन हुआ है। अस्पृश्य लोग अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों से, अपने ऊपर चलाई जाने वाली हुकूमत से ऊब गए हैं। खुद ही राज चलाने को वे आतुर हो गए हैं। अस्पृश्य वर्ग में निर्माण हुई इन तीव्र भावना को वर्ग संघर्ष और वर्गयुद्ध बनने तक बढ़ने नहीं देना चाहिए। इसका असर विभाजन में हो सकता है। वह निश्चित रूप से विनाशकारी दिन होगा। अब्राहम लिंकन ने कहा है कि विभाजित घर ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता। उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी उनके लिए मौके उपलब्ध कर देना देश के हित में, आजादी की रक्षा के हित में, फिलहाल सत्ता का उपभोग कर रहे मुठ्ठी भर लोगों के हित में और कुल मिलाकर जनतांत्रिक संरचना बनाए रखने के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा। जीवन के सभी क्षेत्र में समता और बंधुत्व स्थापित करने से ही यह संभव हो सकता है। इसीलिए मैं इस बात पर इतना जोर दे रहा हूं।
सभागृह को मैं ज्यादा थकाना नहीं चाहता। आजादी खुशी की बात है इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन इस आजादी के साथ हमारे कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारियां आई हैं इस बात को हमें नहीं भूलना चाहिए। आजादी के कारण अब किसी बुरी बात के लिए हम अंग्रेजों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकेंगे। इसके बाद अगर कुछ बुरा होगा तो उसके लिए अपने अलावा किसी और को हम जिम्मेदार नहीं ठहरा सकेंगे। अनुचित प्रसंग होने का बड़ा खतरा है। समय तेजी से बदल रहा है। हमारे लोग भी नई-नई विचारधाराओं को टटोल रहे हैं। लोगों के राज से अब वे ऊब रहे हैं। अब वे लोगों के लिए राज चाहते हैं। राज लोगों का, लोगों द्वारा चुना हुआ है अथवा नहीं इसकी चिंता अब वे नहीं करेंगे। जिस संविधान में हम लोगों का, लोगों के लिए चुने शासन के तत्व का जतन कर रहे हैं उसे अगर सुरक्षित रखना हो तो अपनी राह में क्या अड़चनें हैं इसे पहचानना होगा, जिससे कि लोग लोगों द्वारा चुने गए राज्य से लोगों के लिए राज्य की ओर मुड़ेंगे। इस दिशा में आगे बढ़ने में हमें कमजोर नहीं पड़ना है। देश की सेवा करने का यही एकमात्र उपाय है। दूसरा अगर होगा तो मुझे पता नहीं है।’’ ख्11,
- मूल अंग्रेजी से मराठी में अनुवाद संपादक मंडल द्वारा और हिंदी अनुवाद संध्या पेडणेकर द्वारा किया
गया है।