263 11-1-1950 हिंदू कानून को सिलसिलेवार बनाना होगा। - मुंबई - Page 174

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पत्नियां थीं। उनके बीच पति-पत्नी के रूप में संबंध नहीं होते थे, बल्कि उस पर इस प्रकार का कोई बंधन नहीं था। इसलिए वह बंगाली हर गांव में जाकर अपने लिए पत्नी ढूंढता और वधू के परिवार से वर दक्षिणा भी वसूलता था। इस प्रकार हमारी बहुपत्नी प्रथा भयंकर है। हिंदू कोड बिल का रूपांतरण कानून में होने के बाद इस पद्धति को बंद किया जाने वाला है। नए कानून के अनुसार एक हिंदू केवल एक स्त्री के साथ ही विवाह कर सकता है।

तीसरा सुधार विवाह विच्छेद या तलाक के संदर्भ में है। आज के कानून के अनुसार पत्नी को पति की अर्धांगिनी माना जाता है। एक बार शादी करने के बाद पत्नी किसी भी कारण से पति से अलग नहीं हो सकती और न तलाक ले सकती है। हिंदू विवाह कानून के अनुसार शादी को न खुलने वाली गांठ माना जाता है। असल में जिस स्त्री की अपने पति के साथ नहीं बनती अथवा जिस पति की अपनी पत्नी के साथ नहीं बनती उन्हें जबरदस्ती साथ में रखना ठीक नहीं होता। इसलिए कुछ शर्तों पर पति-पत्नी को एक दूसरे से तलाक मिलने की सहूलियत हिंदू कोड बिल में रखी गई है।

चौथे सुधार के तहत हिंदू कानून के ‘कोपारसिनरी’ पद्धति को नष्ट किया गया है। पुरखों से जो इस्टेट चली आती है उस पर वंशजों के हक के संदर्भ में वर्तमान में दो पद्धतियां प्रचलन में हैं। पहली ‘मिताक्षरा’ और दूसरी ‘दायभाग’। मिताक्षरा पद्धति बंगाल के अलावा अन्य सभी जगहों पर चल रही है। इस पद्धति के अनुसार पिता की मृत्यु के बाद उसके सभी बच्चों को जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में बाप की संपत्ति मिलती है। इस संपत्ति को बेचने के लिए उनके बच्चों की अनुमति की जरूरत होती है। इस पद्धति को प्रतिबंधदाय भी कहते हैं। दयाभाग पद्धति बंगाल प्रांत और आसपास के कुछ हिस्सों में प्रचलित है। इस पद्धति के अनुसार बच्चों को किसी भी तरह के अधिकार नहीं होते, केवल पिता की मृत्यु के बाद ही उन्हें संपत्ति का अधिकार मिलता है। इसके अलावा एक और पद्धति है जिसे उत्तराधिकार का कानून कहते हैं ( Law of Succession )। लेकिन यह हिंदुओं पर लागू नहीं है। सो, नए बिल में मिताक्षरा पद्धति को रद्द कर दिया गया है और दायभाग पद्धति को सब जगह लागू किया जाने वाला है। इससे सब जगह एक-सी पद्धति लागू होगी और सिलसिला बना रहेगा। इस्टेट जोड़ने-बांटने के लिए बाप स्वतंत्र होगा। इससे संपन्नता बढ़ने और आर्थिक उत्पादन बढ़ने में मदद होगी।

पांचवा और आवरी सुधार महिलाओं को उत्तराधिकार में मिलने वाली संपत्ति के अधिकार से संबंधित है। आज महिलाओं को संपत्ति में पूरा हक नहीं मिलता। शादी के समय उसे जो रकम या गहने तोहफे के तौर पर मिलते हैं वही उसका धन माना जाता है। बेटी के अधिकार को लेकर जो भेदभाव है उसे हटाया जाने वाला है। बाप की कमाई में आगे से बेटों की तरह ही बेटियों को भी योग्य हिस्सा मिलेगा। अर्थात्, बेटा