156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और बेटी का भेद अब कानून नहीं मानेगा। महिला को भी समान हिस्सा मिलेगा। अब तक इस तरह की व्यवस्था नहीं थी। 1937 से पहले तो विधवाओं को भी अपने पति की आमदनी पर अधिकार नहीं था। 1937 में एक नया कानून बनाया गया। लेकिन इस कानून में सीमित मालिकियत और बेटियों के समान उत्तराधिकार का अधिकार माना नहीं गया था। इस नए हिंदू कानून के अनुसार ये दो खामियां हटा दी गई हैं।
इन सभी विवरणों को जानने के बाद एक बात आप सभी समझ गए होंगे कि सुधार कैसे करें और किस तरह के सुधार करें इस बारे में मतभेद हो सकते हैं लेकिन सुधार नहीं चाहिए ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता।
सुधार की ओर देखने के तीन नजरिए हो सकते हैं। इन नजरियों से ही आपके विरोध के बारे में जानकारी मिलेगी। एक बुद्धिवादी नजरिए से इन सुधारों को देखा जा सकता है। दूसरा तुलनात्मक अध्ययन कर देखा जा सकता है और तीसरा सनातनियों के नजरिए से देखा जा सकता है। पहले दो नजरिए रखने वालों से विरोध से अधिक संहिताकरण की पद्धति को लेकर मतभेद हो सकते हैं। इसमें अंतर्भूत मूलभूत सिद्धांतों का विरोध वह नहीं करेंगे।
सनातनियों का नजरिया जीवन में क्या कभी स्वीकारा जा सकता है? आज जीवन की सभी बातों पर राज्य के संविधान का असर हो रहा है। उसे सार्वभौमत्व है। मैं इस बात की घोषणा करना चाहता हूं कि मनू का अधिकार अब समाप्त हो चुका है।
हमारे देश में सनातनी मानसिकता का प्रभाव अधिक है। ऐसे ही बहुसंख्यक समाज को साथ लेकर चलना है इसलिए मैं उनकी राय भी जानना चाहता हूं। लेकिन ऐसा करते वक्त मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है कि नए हिंदू कोड बिल में हम जो सुधार लाने जा रहे हैं क्या उन्हें हमारे धर्मशास्त्र का आधार बिल्कुल नहीं है? मैं संस्कृत विद्वान नहीं हूं। हिंदू कानून का पंडित भी नहीं हूं। लेकिन हिंदू धर्मशास्त्रों का मैंने थोड़ा अध्ययन किया है। उसके आधार पर कह सकता हूं कि इन सुधारों के लिए किसी न किसी शास्त्र का आधार दिया जा सकता है।
- फिलहाल जो हिंदू कानून है वह जाति को मानता है। जाति को मां के समान माना जाता है क्योंकि यह कानून ‘मातृसावर्ण्य’ मानता है। लेकिन, क्या मातृसवर्ण का नियम विश्वव्यापी है? क्या आदिमयुग से यह नियम लागू है? या कि, मातृसवर्ण का नियम नया है? नया अगर है तो पुराना नियम क्या था? हमें इन सवालों पर ध्यान देना होगा।
आज जैसे लोग जाति को लेकर सवाल उठाते हैं उसी प्रकार पुराने समय में भी यह सवाल उठा करता था। बच्चे की जाति मां की जाति से तय हो या कि पिता की जाति से? इस बारे में मनुस्मृति में ‘अवांतर वर्ण’ नामक एक पद्धति बताई गई है जिसके तहत कहा गया है कि पिता ब्राह्मण हो और माता क्षत्रिय हो तो बच्चे की जाति ब्राह्मण ही