263 11-1-1950 हिंदू कानून को सिलसिलेवार बनाना होगा। - मुंबई - Page 176

 157

मानी जाए लेकिन ब्राह्मण पिता और वैश्य माता के बच्चे को वैश्य माना जाए। लेकिन मनुस्मृति से पहले वाले ग्रंथ में पिता की जाति ही संतान की जाति कहने-मानने के उदाहरण भी मिलते हैं। राजवाडे द्वारा लिखित ‘राधामाधवविलासचंपू’ में ऐसे उदाहरणों की एक लंबी सूची ही दी गई है। क्षत्रीय जाति का शांतनु और शूद्र जाति की गंगा से उत्पन्न भीष्म को क्षत्रीय ही माना जाता है। ब्राह्मण पराशर का पुत्र था कृष्णद्वैपायन। उनकी माता मत्स्यगंधा जाति से मछुआरन थी। लेकिन कृष्णद्वैपायन को ब्राह्मण ही माना जाता है। विश्वमित्र क्षत्रिय और मेनका अप्सरा। इस दंपति की पुत्रि शकुंतला को क्षत्रिय माना जाता है। जरत्कारू ब्राह्मण था और जरत्कारी नागिन थी। उनका पुत्र आस्त को ब्राह्मण माना जाता है। पिता की जाति ही बच्चे को दी जाती रही है। मेरा सवाल है कि आज अगर इसी पद्धति को स्वीकारा जाता है तो पुरानी रूढि़याँ कहां टूटती हैं?

(‘जनता’ का बीचवाला पन्ना उपलब्ध नहीं हो पाया - संपादक)

करें और दूसरी शर्त कि पहली पत्नी के निर्वाह के लिए अगर पहले ही बड़ी रकम दे रहे हो तो यह शर्त सबसे अधिक कठिन है।

सो, इन शर्तों का अर्थ एक ही है कि कौटिल्य एक पत्नीव्रत ही चाहते थे।

नए हिंदू कानून में तलाक के संदर्भ में जो शर्तें हैं उसे पराशर स्मृति का आधार दिया जा सकता है। पराशर स्मृति में अगर महिला दूसरा विवाह करना चाहे तो पति का नपुंसक होना, लापता होना या मृत होना जरूरी माना जाता है। इससे एक बात साबित होती है कि पुरुष का स्त्री से विभक्त होने का अधिकार पहली शर्त में माना गया है। हमने हिंदू कोड बिल में तलाक की शर्तें बढ़ा कर उसकी व्याप्ति विस्तृत की है। यानी कहा जा सकता है कि तलाक के मुद्दे पर पराशर स्मृति जैसा कोई अन्य अधिकारपूर्ण आधार नहीं है।

महिलाओं के उत्तराधिकार के बारे में प्रसिद्ध स्मृतिकार बृहस्पति का आधार दिया जा सकता है। उसने कहा है कि विधवा की संपत्ति पर कोई भी अपना उत्तराधिकार नहीं बता सकेगा। इसके लिए कारण देते हुए उन्होंने कहा है कि, महिला चूंकि पुरुष की अर्धांगिनी होती है इसलिए पति की मृत्यु के बाद वह अपनी अर्धांगिनी के रूप में जीती है। इसीलिए अर्धांगिनी के धन पर किसी का अधिकार नहीं हो सकता। मुझे लगता है कि उसकी यह राय बेहद सशक्त है और इसे मानने में किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।

मिताक्षरी उत्तराधिकार पद्धति के लिए मनु का भी विरोध था इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। मैं अगर बताऊं तो आपको शायद आश्चर्य लगेगा कि मनु भी संयुक्त परिवार पद्धति का विरोधी था। परिवार की संपत्ति के लिए उसका विरोध था। उस समय यज्ञ को ही सर्वश्रेष्ठ कर्म माना जाता था। आर्य मानते थे कि यज्ञ जितने अधिक पैमाने पर होंगे उतने ही अधिक पैमाने पर धर्म का प्रचार-प्रसार होगा। महिलाओं को वेदाभ्यास