263 11-1-1950 हिंदू कानून को सिलसिलेवार बनाना होगा। - मुंबई - Page 177

158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की इजाजत न होने के कारण वे यज्ञ नहीं कर पाती थीं। इसीलिए संपत्ति पर भी उनका अधिकार नहीं था। तब यज्ञ और संपत्ति के बीच निकट संबंध हुआ करता था। सो, मनु कहते हैं, ‘अगर धर्म का अधिक प्रचार करना हो तो अधिक यज्ञ करने होंगे’ इस नियम को लागू करना हो तो संयुक्त परिवारों के कारण क्या यज्ञों की संख्या कम नहीं होगी? इस धार्मिक दृष्टिकोण के सहारे ही बताइए क्या संयुक्त परिवार पद्धति धर्मविरोधी नहीं है? और मिताक्षरी उत्तराधिकार पद्धति का आधार संयुक्त परिवार पद्धति ही है। मैं सनातनियों से यह पूछना चाहता हूं कि आपका मनु संयुक्त परिवार का विरोधी था क्या आप यह मानने के लिए तैयार हैं?

इसके बाद दत्तक या गोद लेने के विधान के बारे में सोचते हैं। हिंदुओं में गोद लेने की प्रथा का उद्गम कहां है यह भी देखना जरूरी है। मनु के कथनानुसार हिंदु व्यक्ति को जिन चार ऋणों से जीवन व्यातीत करना पड़ता है उनमें से एक है पितृऋण। इस ऋण से मुक्ति पाने के लिए एक पुत्र होना ही काफी होता है। एक से अधिक पुत्रों का होना निजी अभिलाषा का प्रतीक कहा जा सकता है। इसीलिए मनु अन्य पुत्रों का संपत्ति पर अधिकार मानने के लिए भी तैयार नहीं है। सो, इसके आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तराधिकार की मिताक्षर पद्धति मनू के बाद की है। मनु द्वारा अन्य पुत्रों का परिवार की संपत्ति पर अधिकार को मान्यता न दिए जाने के कारण जो मुश्किल हालात पैदा हुए थे उन्हीं में से गोद लेने की पद्धति निर्माण हुई। आपस्तंभ सूत्र में तो पुत्र के बेचने का या उसे दान में देने का कड़ा विरोध जताया गया है। इसलिए मैं सनातनियों से पूछना चाहता हूं कि क्या गोद लेना शास्त्रसंम्मत है? लेकिन आगे चलकर समाज की जरूरत को ध्यान में लेकर वशिष्ट स्मृतियों में बदलाव किया गया। उन्होंने कहा कि, आपस्तंभ स्मृतियों का बंधन केवल घर के ज्येष्ठ पुत्र के बंधन के संदर्भ में लागू है। अन्य पुत्र गोद लिए या दिए जा सकते हैं। सो, इस प्रकार गोद लेने की प्रथा आई।

इन सभी बातों को आधारों के सहारे ध्यानपूर्वक सोचने के बाद हम यकीनन कह सकते हैं कि आज का प्रचलित हिंदू कानून ही शास्त्रों द्वारा संमतिप्राप्त नहीं है। हिंदू धर्मशास्त्रों के साथ उसका कोई ताल्लुक नहीं है। मूलशास्त्र की तुलना में उसमें बहुत अधिक बदलाव हुआ है। मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि सनातनी लोग शाÐों का ठीक से अध्ययन नहीं करते। बल्कि मैं तो यह भी कहना चाहता हूं कि हमारे नए सुधारों के लिए ही किसी न किसी शास्त्र का आधार प्राप्त है।

इसीलिए मेरी स्पष्ट राय है कि नया हिंदू कोड बिल न तो क्रांतिकारी है और न ही उग्र है। मैं किनारों के पास ही नाव चलाने वाले लोगों में से हूं। पैसिफिक में यात्रा के लिए निकले एकाकी साहसी यात्री की तरह मैं नहीं हूं। अगर उग्र बिल ही बनाना होता तो वह इस बिल से बिल्कुल अलग होता। आज का यह बिल सर्वश्रेष्ठ मध्यम