263 11-1-1950 हिंदू कानून को सिलसिलेवार बनाना होगा। - मुंबई - Page 178

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मार्ग है। मैं सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखता हूं। इसीलिए आप सब लोग इस बारे में सोचें।

हमसे एक और सवाल भी पूछा जाता है कि क्या हम हिंदुओं को परेशान करने के लिए यह बिल बना रहे हैं? हिंदू शास्त्र में गलतियां हैं, दोष भी हैं लेकिन उन्हें वैसे ही रहने दीजिए। आप क्यों “स्तक्षेप कर रहे हैं? हिंदु दुर्बल हैं, अहिंसावादी हैं इसीलिए हम उन्हें परेशान करते हैं ऐसा उनका कहना है। उनका हम पर आरोप है कि मुसलमानों के धर्म में कोई फेरबदलाव किया तो वे हिंसात्मक कृत्य करेंगे, सरकार के विलाफ असंतोष फैलाएंगे इसलिए हम उनके कानून में फेरबदलाव लाने से डरते हैं। हिंदुओं में विरोध करने की ताकत नहीं है इसलिए हम उनके कानूनों में बदलाव कर रहे हैं आदि सब गलतफहमियां है।

हमारी राय तो यह है कि धर्म और भौतिक अधिकारों के हकों के बीच कोई संबंध नहीं होना चाहिए। हमें लगता है कि पूरे देश के लिए एक समान कानून हो, एक सिविल कोड हो। इस प्रकार का प्रावधान हमारे संविधान में है और इस बारे में उसमें निर्देश भी दिए गए हैं।

लेकिन ऐसा सिविल कोड कैसे बनेगा? स्वर्ग से उतरेगा या कि उसे विदेशों से आयात करना होगा? कानून का हमेशा धीमे-धीमे विकास होता है। वास्तविक स्थितियों से वह पैदा होता है। इसलिए, हिंदू कोड नए सिविल कोड की पहली पायदान है। इसीलिए आज हिंदू कोड का संहिताबद्ध होना जरूरी है। उसी से हम ‘महत्तम साधारण विभाजक’ निकाल सकते हैं। उसके बाद हम मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों के पास जाकर उन्हें इन सुधारों की दिशा के बारे में अवगत कराएंगे। लेकिन मेरे हाथ में जब तक कुछ मुद्दे नहीं होंगे तब तक क्या नया सिविल कोड बनाना संभव हो पाएगा? इन बातों पर विरोध करने वाले एक बार जरूर सोचें। हिंदुओं के साथ पक्षपात करने का इसका कत्तई उद्देश्य नहीं है। अपने सिविल कोड के लिए आवश्यक भूमिका तैयार करना मात्र उद्देश्य है।

यह बिल एकांगी नहीं है। सनातनी मतों का इसमें विरोध नहीं है। केवल नए आचार-विचारों को मान्यता दी गई है। जिन्हें नई राय, नई आचार पद्धतियां पसंद नहीं हैं वे उनका पालन करें ऐसा मेरा आग्रह नहीं है।

किसी सनातनी व्यक्ति को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा अपनी बेटियों को नहीं देना हो तो वह अपने वसीयत में उसका स्पष्ट उल्लेख करे या कहे कि अपनी बेटी हिंदू नहीं है। हिंदू स्मृति इस बात की उसे पूरी आजादी दे रही है। इस प्रकार नए सुधारों से आप मुक्त भी रह सकते हैं। इसलिए सनातनी सोच का उसमें विलय हो रहा है यह सफेद झूठ है। यह सर्वोत्तम स्वर्णमध्य है। इस प्रकार मैं कहूंगा कि सनातनी अपनी राह खुद चुनें, लेकिन अन्य सभी उसी राह पर चलें इस बात के प्रति आग्रही न रहें।