264 11-1-1950 विदेशियों की गुलामी अगर दुबारा झेलनी पड़े तो वह आत्मनाश ही होगा - मुंबई - Page 182

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अम्बेडकर और डॉ. माईसाहेब अम्बेडकर का सार्वजनिक सम्मान समारोह मुंबई शहर उपनगर शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की ओर से मुंबई के नरेपार्क मैदान पर संपन्न हुआ। इस अवसर पर 2 लाख से अधिक दलित बंधु-भगिनियों का समुदाय उपस्थित था।

खासकर बहनों की उपस्थिति बहुत अधिक थी। अपने भक्ति-भाव के प्रतीक स्वरूप अस्पृश्य भाई-बहनों ने डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को संविधान के आकार का स्वर्ण बक्सा और रु. 2000 अर्पण किए। इस प्रकार उन पर अपनी निश कायम होने की बात उन्होंने दुनिया के सामने स्पष्ट की।

सचमुच अभूतपूर्व समारोह था

इस समारोह की तैयारियों के लिए बहुत ही कम समय मिला और उसकी तुलना में कार्यक्रम को मिली सफलता अभूतपूर्व ही कही जा सकती है। 11 तारीख के कार्यक्रम की सूचना अस्पृश्य बंधुओं को 10 तारीख को ही दी जा सकी। तब से मुंबई शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के कार्यकर्ताओं में हडबड़ी मची हुई थी। रातोंरात हैंडबिल बांटकर, थालियां पीट कर और मोटर में बैठकर हर मोहल्ले में घूम-घूम कर डॉ. बाबासाहेब के सम्मान समारोह की जानकारी दी गई और इतने कम समय में प्रचार के बावजूद 2,00,000 लोग जुटे। यह बात सचमुच अभूतपूर्व ही थी। इतना विराट जनसमुदाय किसी भी नेता के सम्मान समारोह के लिए पिछले 50 सालों से मुंबई में इकठ्ठा हुआ होगा ऐसा नहीं लगता।

सम्पूर्ण व्यवस्था अनुशासन से परिपूर्ण थी

करीब चार वर्ष के बाद शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन का नीलवर्ण का ध्वज नरे पार्क के भव्य मैदान में फक्र से फहर रहा ता। नरे पार्क के चारों तरफ से किसी महायात्रा के समान अस्पृश्य जनता की हुजूम उमड़ रहा था। उनकी व्यवस्था और अनुशासन कायम रखने के लिए मार्ग के दोनों तरफ और मैदान के चारों ओर स्वयंसेवक खड़े थे। समारोह के लिए एक छोटा-सा लेकिन सुंदर पंडाल लगाया गया था। लाऊडस्पीकर की व्यवस्था भी की गई थी। आम महमानों के लिए करीब 500 कुर्सियां लगाई गई थीं। महिलाओं के लिए खास इंतजाम किया गया था। कुल मिला कर समारेह की व्यवस्था बहुत ही सुचारू चाकचौबंद रखी गई थी।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का आगमन

शाम 6.30 बजे डॉ. बाबासाहेब का आगमन हुआ। तब जनसमुदाय ने ‘अम्बेडकर जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारे लगाए गए। लोगों से अटा पडा नरे पार्क इन नारों से गूंज उठा। डॉ. बाबासाहेब के मंच पर आते ही फोटोग्राफरों का समूह खड़ा हुआ। वे फटाफट डॉ. बाबासाहेब के अलग-अलग पोजेस में फोटो लेने लगे। कोई नीचे बैठकर, कोई घुटने