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शब्द कहने की जरूरत नहीं पड़ी थी। इसलिए कुछ लोग ऐसा कह रहे थे कि मैं दिल्ली में रहता हूं इसलिए अन्य प्रांतों में भी और कुल मिलाकर राजनीतिक हलके में मेरे पैरों के नीचे की रेत खिसकती जा रही है। ऐसी सोच रखने वाले और मानने वाले लोग यहां हों, तो उन्हें पता चला होगा कि मेरे पैरों के नीचे की रेत बह नहीं गई है बल्कि और मजबूत हो गई है। (तालियों की गड़गड़ाहट) किसी राजनीतिक दल की ओर से बुलाई गई इतनी बड़ी सभा अन्य किसी राजनीतिक नेता की अध्यक्षता में हुई हो ऐसा मुझे नहीं लगता। सिनेमा देखने के लिए जैसे कुछ लोग जाते हैं उसी तरह कुछ लोग एकाध-दो नेताओं को देखने के लिए जाते हैं। लेकिन अपने राजनीतिक दल के नेतृत्व में आज भी इतनी प्रचंड सभाएं होती हैं। इससे मुझे लगता है कि हमारे संगठन का अभी विघटन नहीं हुआ है। इसीलिए मेरा अभिनंदन करने के लिए यहां जो लोग इकठ्ठा हुए हैं उन सभी महिलाओं और पुरुषों का तथा सभा के आयोजकों को मैं मन से धन्यवाद देता हूं। (तालियों की प्रचंड गड़गड़ाहट)
अपने राष्ट्र का संविधान लिखने की जिम्मेदारी मुझ पर आई यह एक एकमेव स्थिति है। भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान समिति बनाई गई तब मेरी हालत क्या थी यह आपको पता तो होगा ही। 1946-47 में हुए चुनावों में शड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन की हार हुई थी। हालांकि इस पराजय के बारे में शर्म महसूस हो ऐसी कोई बात नहीं है। क्योंकि उन चुनावों के दौरान पूरा भारत एक तरफ था और हमारा दल दूसरी तरफ था। एक ओर प्रबल राजनीतिक संगठन था और दूसरी तरफ अल्पसंख्य अस्पृश्यक, उन्हें उस ताकतवर संगठन से लड़ाई लड़नी थी अर्थात्, उस वक्त पराजय ही हमारा भविष्य था।
लेकिन हारने के बाद रुकने से कैसे काम चलता। हम लोगों को किसी प्रकार संविधान समिति में शामिल होना था। अस्पृश्यों के राजनीतिक अधिकार संविधान समिति के सामने रखने का मौके की तलाश में हमारे प्रतिनिधि थे। वह प्रसंग बड़ा ही कठिन था। काँग्रेस और शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन के बीच कड़ा विरोध था और इसी कारण इस दल का संविधान समिति में प्रवेश न होने देने का काँग्रेस ने निश्चय ही किया हुआ था। (शेम, शेम की ध्वनि) काँग्रेस ने मेरा संविधान समिति में जाना हर तरह से असंभव कर रखा था। आखिर मैंने बंगाल प्रांत से प्रवेश पाने का मार्ग ढूंढ निकाला और वहां गया। अस्पृश्य वर्ग के अधिकार उन्हें मिलें, हिंदुओं के राज्य में उन्हें कुछ सहूलियतें मिलें बस इतना ही मेरा सीमित उद्देश्य था।
राष्ट्र का संविधान निर्माण करूं यह मेरी महत्वाकांक्षा नहीं थी। जहां समिति की सदस्यता भी मुझे नहीं मिल पा रही थी, वहां मैं अधिकार से कुछ बेहतर कर पाऊंगा ऐसी कल्पना करना भी मेरे लिए संभव नहीं थी। उन्होंने तय किया था कि किसी को