264 11-1-1950 विदेशियों की गुलामी अगर दुबारा झेलनी पड़े तो वह आत्मनाश ही होगा - मुंबई - Page 185

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भी अंदर आने देंगे लेकिन डॉ. अम्बेडकर को नहीं। संविधान समिति के दरवाजे मेरे लिए बंद थे ही खिडकियां भी बंद की गई थीं। आसपास के छेद भी बंद कर दिए गए। लेकिन आपके प्यार और स्नेह की ताबुद्ध से मैं अंदर पैर रख पाया और विधिलिखित ऐसा था कि जिसे अंदर पैर नहीं रखने देने का निश्चय लोगों ने किया था उसी को यह बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। (हियर हियर की ध्वनि) जो कुछ भी हुआ बहुत ही सौभाग्य के कारण हुआ क्योंकि इतना महान कार्य करने का मौका इंसान को कभी-कभार ही मिलता है। यह बात मेरे लिए गौखमयी है उसी प्रकार आपके लिए भी है। (तालियों की गूंज)

वैसे देखा जाए तो मैंने इसमें कुछ खास नहीं किया है। लेकिन इस कार्य से एक बात पूरा हिंदू समाज मानने लगा है। पिछले 20 सालों से मुझ पर कई तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं। मैं और मेरा दल राष्ट्रद्रोही हैं, यह अंग्रेजों का साथी है, मुसलमानों का पिछलग्गु है इस प्रकार के निहायत झूठे किस्म के आरोप मुझपर किए जा चुके थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ऐसे नहीं हैं इस बारे में अब उन लोगों को यकीन हुआ है। 20 सालों से हमारे दल पर जो कलंक लगा था वह अब धुल गया है। शेड्यूल्ड कास्टस् फेडरेशन एक सुसंगठित मजबूत राजनीतिक रूप आख्तियार करने वाला लेकिन राष्ट्रद्रोही कृत्यों में कभी भी शामिल नहीं होने वाला दल है इस बारे में सबको यकीन हुआ है।

आज की राजनीति में, मैं अब जाना नहीं चाहता। लेकिन कुछ बातें कहने का मन अवश्य हो रहा है।

पहले हमारी राजनीति शत्रुता की बुनियाद पर हुआ करती थी। काँग्रेस वाले हमें और हम काँग्रेस वालों को दुश्मन की तरह माना करते थे। मुझे लगता है कि पहले अस्पृश्य वर्ग के सभी नेता कुछ संकीर्ण नजरिया रखते थे और उसी के अनुसार बर्ताव भी करते थे। मैं खुद भी कुछ हद तक इस दोष से ग्रसित था। हमें लगता- हमारा क्या होगा? हिंदुओं के हाथ में राजनीतिक सत्ता आई तो क्या होगा? लेकिन राजनीति का यह रुख हमें बदलना ही होगा।

हम अपने लोगों का हित देखा करते थे उस बात को आगे जारी तो रखना ही होगा, लेकिन साथ ही साथ अब एक बात हमें पक्की तौर पर ध्यान में रखनी होगी। अपने देश को मिली आजादी को कैसे बरकरार रखा जा सकता है इस बारे में हमें सोचते रहना होगा। पहले भी आजादी मिलने के बाद भी हमारे देश को पराश्रित रूप में गुलामी में जीना पड़ा है। पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेजों ने हमारी आजादी छीनी थी। आजादी की जितनी जरूरत ऊंचे वर्ग के लोगों को है उतनी ही जरुरत निम्न वर्ग के लोगों को भी है। अंग्रेजों की गुलामी से हम आजाद हुए हैं। लेकिन अब फिर विदेशियों की गुलामी