168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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ईमानदारी, कर्तव्यों के प्रति जागरुकता महाराष्ट्र की परंपरा है
और राष्ट्रहित का दृष्टिकोण
दिल्ली की सभी महाराष्ट्रीयन संस्थाओं की ओर से 27 जनवरी, 1950 के दिन दोपहर 1 बजे से बृहन् महाराष्ट्र भवन में स्वतंत्रता दिवस बड़ी धूम-धाम से मनाया गया। शहर में उस दिन मनाए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को ध्यान में रखते हुए एक छोटा-सा कार्यक्रम आयोजित किया गया था। तय कार्यक्रम के अनुसार ठीक डेढ़ बजे दिगंबर पलुस्कर के गायन का कार्यक्रम शुरू हुआ। उनके बाद बिस्मिल्ला पार्टी का शहनाई वादन हुआ।
महाराष्टियों का कर्तत्व
उसके बाद नियोजित अध्यक्ष डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर के अध्यक्ष पद की सूचना ना. काकासाहब गाडगिल द्वारा दी गई। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले कई सालों से भारत की जनता जिस महत्वपूर्ण दिन की राह देख रही थी वह दिन कल था। पराधीनता और राजसत्ता के सारे बंधन तोड़ कर भारत के जनतंत्र पर मुहर लगी। ऐसे जनतंत्र का संविधान लिखने वाले डॉ. बाबासाहेब आज पधारे हैं। यह सहज ही है कि इतना महत्वपूर्ण काम हम में से ही एक महाराष्ट्रीयन व्यक्ति के द्वारा संपन्न हुआ इसका सबको गर्व है। दिल्ली के सभी महाराष्ट्रीयन व्यक्तियों की ओर से मैं उनका हार्दिक स्वागत करता हूं।’’ ना. गाडगिल ने फिर डॉ. अम्बेडकर और माईसाहब को फूलमालाएं अर्पण कीं।
समारोहों का शौक नहीं
उसके बाद डॉ. बाबासाहेब का संक्षिप्त भाषण हुआ। उन्होंने कहा-
दिल्ली की महाराष्ट्रीयन संस्थाओं की ओर से कई बार मुझसे अलग-अलग अवसरों पर उपस्थित रहते हुए अपना वक्तव्य सुनाने के लिए कहा गया था। लेकिन पिछले तीन सालों में, मैं संविधान समिति के कामों में व्यस्त था, इसलिए आमंत्रण स्वीकार नहीं कर पाया था। अर्थात्, मैं महाराष्ट्रीयन समारोह में जैसे उपस्थित नहीं रह पाया था, उसी तरह अन्य किसी भी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं रह पाया था। कृपा कर ऐसी गलतफहमी नहीं पालना कि यहां सम्मान होगा इसलिए मैं यहां आया हूं। एक तो, मैं स्वभाव से ही अकेले रहना पसंद करने वालों में से हूं, ऐसे समारोहों में शरीक होने का मुझे शौक नहीं
जनताः 4 फरवरी, 1950