265 27-1-1950 महाराष्ट्र की परंपरा है ईमानदारी, कर्तव्यों के प्रति जागरुकता और राष्ट्रहित का दृष्टिकोण - नई दिल्ली - Page 188

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है। किताबें पढ़ना और अपना काम करना इसके अलावा अन्य किसी बात में मेरा मन लगता नहीं, इसलिए मैं ज्यादातर कार्यक्रमों में शरीक नहीं होता। आज आप सभी लोगों नें मुझे यहां बुलाकर मेरा सम्मान किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।

संविधान समिति में मेरा योगदान बहुत बड़ा है ऐसा मैं नहीं मानता, क्योंकि यह संविधान बनाते समय विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन कर उनमें से अपने देश के योग्य अनुच्छेद चुनना केवल इतना ही हमारा काम था। हमने वही किया। सबसे महत्वपूर्ण बात अगर हमने कोई की है तो पूरे देश की एक राजभाषा हमने तय की। इसी प्रकार अगर हम लिपि के साथ भी कर पाते तो बहुत अच्छा होता। लेकिन समयाभाव के कारण नहीं हो पाया। अपने देश में सैकडों भाषाएं बोली जाती हैं। ऐसे विशाल देश की एक राजभाषा तय कर पाना यह सचमुच बहुत बड़ी बात हुई। लोगों का अब भी यही कहना है कि अलग-अलग प्रांतीय भाषाएं अपने अपने प्रांतों में प्रचलित रहेंगी। लेकिन एक राजभाषा तय होने के बाद भारत के हर नागरिक के लिए का सिलसिला शुरू होगा और उसके जरिए सहज ही संगठन होगा। राष्ट्र को अगर बलिष्ठ बनाना हो तो ऐसे संगठनों की कितनी आवश्यकता है यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है।

महाराष्ट्रियनों के बारे में बोलना हो तो एक ऐसी मानसिकता हममें पल रही है कि जिसके कारण हर क्षेत्र में पीछे हैं। मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता और आप भी ऐसी राय ना बनाएं। जनसंख्या के बारे में सोचें तो महाराष्ट्रीयन अल्पसंख्यक हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार में हम दो महाराष्ट्रीयन मंत्री हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नरशिप का सम्मान भी एक महाराष्ट्रीयन व्यक्ति को ही मिला है। उसी प्रकार राजनीति, विद्वत्ता स्वार्थत्याग आदि सभी गुणों में यह मानने की जरूरत नहीं कि हमारा प्रांत अभी पिछड़ा हुआ है। मैं तो यह कहूंगा कि अन्य किसी भी प्रांतों के नागरिकों से महाराष्ट्रीयन व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक सजग होता है। वह अधिक ईमानदार है और राष्ट्र के लिए अधिक से अधिक त्याग करने के लिए वह तैयार होता है। महाराष्ट्र की उज्ज्वल परंपरा है और उसे कायम रखने के लिए विद्या के प्रति समर्पितता की जरूरत है। यह वर्ग बेहद गर्वीला है। गर्वीला होना बुरा नहीं लेकिन अतिरिक्त अद्धम अच्छा नहीं। असली गर्व पूर्ण विद्याप्राप्ति से ही आता है। आप सभी लोगों से मेरा यही कहना है कि महाराष्ट्र की परंपरा को कायम रखना हो तो अपनी विद्या के प्रति आसक्ति को कम नहीं होने देना चाहिए। जिन गुणों से हम अपनी परंपरा को बनाए रख सकते हैं उनका पालन-पोषण करना होगा। वे गुण हैं - ईमानदारी, कर्तव्यों का अहसास, बताए मार्ग पर चलते हुए राष्ट्रीय हितों का नजरिया रखना। एक बात की हममें कमी है और वह है वाक्पटुता हर युवक द्वारा इस कला में प्रवीणता हासिल किए बगैर आगे राजनीति में प्रजातंत्र पद्धति में वे टिके नहीं रह सकते। यहां बुलाकर आपने मेरा जो सम्मान किया उसके लिए मैं आप सभी के प्रति आभारी हूं।