170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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भारत महानता बौद्ध धर्म के कारण है
दो मई, 1950 का दिन भारत के इतिहास में और खासकर अस्पृश्य जनता के आंदोलन में स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा। इसी दिन दिल्ली में भगवान बुद्ध की 2494वीं जयंती डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में अस्पृश्य समाज द्वारा सार्वजनिक रूप से मनाई।
करीब 22 वर्ष पूर्व अस्पृश्य समाज द्वारा महाड़ में मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन किया गया था और इस निश्चय की घोषणा की थी कि गुलामी लादने वाले हिंदू धर्म में अस्पृश्य समाज ना रहे। इस पृष्ठभूमि पर दिल्ली की बुद्ध जयंति का खास महत्व था, इसमें दो राय नहीं।
बुद्ध जयंति में करीब 20000 अस्पृश्य बंधु-भगिनियों का समुदाय उपस्थित था। विभिन्न राष्ट्रों के विदेशी वकीलों की उपस्थिति इस समारोह की विशेषता थी। इसके अलावा बौद्ध भिक्षुओं का बड़ा समुदाय भी उपस्थित था।
इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो भाषण दिया वह बेहद श्रवणीय और विस्फोटक रहा। उनके वक्तव्य के कारण अखबारों में जो हलचल मची थी, उसके बारे में सभी जानते हैं। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का दृढ़कंप मचाने वाला भाषण इस प्रकार है-
उपस्थित सज्जनों, बहनों और भाइयों,
मैंने तय किया है कि आज इस अवसर पर मैं हिंदी में बोलूं। इस बारे में यहां उपस्थित सम्माननीय मेहमानों से मैं पहले ही माफी मांगता हूं। अंग्रेजी में बोलने की मेरी इच्छा थी लेकिन अगर मैं अंग्रेजी में बोलता तो यहां उपस्थित विदेशी मित्र मेरे विचार समझ सकते, लेकिन यहां उपस्थित अधिकांश अंग्रेजी नहीं जानते। इसलिए अंग्रेजी में मेरा बोलना उनके साथ अन्याय करने जैसा होगा, इसलिए मैं हिंदी में बोल रहा हूं।
बार-बार सार्वजनिक सभाओं में जाकर किसी विषय पर जानकारी देने के बहाने भाषण देते रहने की मेरी आदत नहीं है। दिल्ली आने के बाद, मैं इनी-गिनी सभाओं में ही उपस्थित रहा हूं। बेवजह लोगों का समय जाया करना मुझे ठीक नहीं लगता। जनता का समय लेना ही हो तो पहले अपने पास उनकी नीति में सुधार लाने के लिए तथा
जनताः 13 मई, 1950