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174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए बौद्धधर्मी देश त्याग करें

दिनांक 25 मई, 1950 से ‘सिलोन बुद्धिस्ट काँग्रेस’ द्वारा सिलोन (श्रीलंका) की पुरानी राजधानी कॅण्डी में ‘विश्व बुद्ध परिषद’ का आयोजन किया गया था। 6 जून, तक वह जारी रहनी थी। उसमें एशिया तथा यूरोपीय राष्ट्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहने वाले थे। इस परिषद में बौद्ध धर्म की शिक्षा के अनुसार दुनिया में शांति की स्थापना पर विचार किया जाना था। मुख्य प्रधान डी. एस. सेनानायके प्रतिनिधियों का कोलंबो रेसकोर्स पर स्वागत करने वाले थे। इस परिषद में भारत सरकार के कानून मंत्री डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर भी शरीक होने वाले थे।

दिनांक 23 मई, 1950 के दिन डॉ .बाबासाहेब अम्बेडकर हैदराबाद होते हुए मद्रास पहुंचे। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के स्वागत के लिए वहां उपस्थित अधिकारी, कार्यकर्ता, चाहने वाले आदि जिनमें प्रमुख श्री कामराज नाडर भी थे। बाबासाहेब ने पत्रकारों से कहा, ‘बौद्ध धर्म के बारे में मुझे आस्था है और मुझे परिषद की ओर से आमंत्रण मिला है इसलिए मैं वहां जा रहा हूं।’ उसके बाद वे कोलंबो के लिए रवाना हुए।

आज से छह वर्ष बाद बुद्ध युग के 2500 वर्ष पूरे होंगे, तब दुनिया में बौद्ध धर्म की लहर फैली होगी यह आशावाद विश्व बौद्ध भातृसंघ की स्थापना करने का प्रस्ताव रखते हुए सिलोन की बौद्धप्रमुख सी. बी. नुगावाला ने कॅण्डी (सिलोन) में आयोजित इस परिषद में व्यक्त किया। इस प्रस्ताव के लिए इंग्लैंड की सुश्री कॉन्स्टन्स लाऊन्सबरी, ब्रह्मदेस के यू चान चन, बंगाल के डॉ. अरविंद बरुआ, जापान के रिरी नाकायमा, इटली के लोकनायके और थाईलैंड के सुवित निमहेंद्र ने समर्थन किया।

दिनांक 26 मई, 1950 के दिन यहां के ‘टेंपल ऑफ दि ट्रद्भथ’ नामक बिहार में 27 देशों के बौद्धधर्मीय प्रतिनिधि इकठ्ठा हुए और उन्होंने बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के बारे में चर्चा की। भारत के कानून मंत्री डॉ. बी. आर. अम्बेडकर भी इस अवसर पर उपस्थित थे। हालांकि अधिकृत प्रतिनिधि न होने के कारण उन्होंने चर्चा में हिस्सा नहीं लिया। विश्व मैत्री का प्रस्ताव परिषद द्वारा मंजूर किए जाने के बाद बाबासाहेब का भाषण हुआ।

उन्होंने कहा-

दलित बंधुः 28 मई, 1950