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मैं इस भ्रातृसंघ का भले सदस्य नहीं बना हूं, लेकिन मेरी इस भेंट का उद्देश्य बहुत गंभीर है। सभी बौद्ध देशों को चाहिए कि वे केवल भ्रातृसंघ की स्थापना करने के बजाए बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए त्याग करने की मानसिक तैयारी करें। बौद्ध धर्म के समारोह भारत के लोगों को देखने का मौका मिलना चाहिए। भारत के कानून मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि, मैं चाहता हूं कि भारत में बौद्ध धर्म के केवल बाह्योपचार का ही अनुसरण किया जाता है या फिर सही बौद्ध धर्म का अनुसरण किया जाता है इस बारे में भारतीय जानें। बौद्ध धर्म जागृत है अथवा केवल परंपरागत है यह भी मैं देखना चाहता हूं।
विश्व मैत्री प्रस्ताव के बारे में भी उन्होंने अपने भाषण में नाराजगी व्यक्त की। अपना अभिप्राय व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बौद्धधर्मीय देशों को इस धर्म के विस्तार के लिए कमर कसनी चाहिए, उसके लिए आवश्यक त्याग करने चाहिए और इस प्रकार की कोई घोषणा परिषद में होनी चाहिए थी।
बाबासाहेब ने कहा कि-
‘‘1. बौद्ध धर्म के आचार (पद्धति) और उपचार (विचार) भारत में देखने को
नहीं मिलते, उन्हें देखने के मौकों का लाभ उठाएं।
- साथ ही यह भी देखें कि बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों से मेल न खाने वाली
श्रद्धाओं से बौद्धधर्मी कितने ग्रस्त हैं और मूल विशुद्ध स्वरूप में वह धर्म
कितना बचा है।
- और दुनिया सिलोन को बौद्ध धर्मी कहती है इसलिए सिलोन बौद्ध धर्मानुयायी
है या कि वह धर्म आज भी वहां जीवित स्वरूप में प्रचलित है इस बारे में
खोज करें।
मैं इन्हीं तीन उद्देश्यों पर काम करने के उद्देश्य से इस परिषद में आया हूं। मित्रता के प्रस्तावानुसार मैं अधिकृत मित्र न होऊं लेकिन यहां आने का मेरा उद्देश्य गंभीर है।’’