268 6-6-1950 बौद्ध धर्म के कई तत्वों को हिंदु धर्म ने आत्मसात किया - कोलंबो - Page 195

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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बौद्ध धर्म के कई सिद्धान्तों को हिंदु धर्म ने आत्मसात किया

दिनांक 6 जून, 1950 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने वाई. एम. बी. ए. कोलंबो द्वारा आयोजित विश्व बौद्ध भ्रातृत्व सम्मेलन में भाषण देते हुए कहा-

भाइयों और बहनों,

किसी विषय की परंपरा के बारे में पूरी जानकारी मिलने के बाद ही उसके बारे में यथार्थ ज्ञान होता है। इसीलिए जिन स्थितियों ने बौद्ध धर्म को जन्म दिया उसे अगर हम जान लें तो बौद्ध धर्म का वास्तविक महत्व जान पाएंगे। भारत में हमेशा से हिंदूधर्म ही रहा है इस राय से मैं सहमत नहीं हूं। हिंदू धर्म का सबसे आखिर में, विचारों में धीरे-धीरे प्रगति होते-होते उदय हुआ। वैदिक धर्म के प्रसार के बाद भारत में तीन बार धर्म परिवर्तन हुआ है। वैदिक धर्म का रुपांतरण ब्राह्मण धर्म में हुआ और ब्राह्मण धर्म का रूपांतरण हिंदु धर्म में हुआ। समाज के विभिन्न वर्गों में विभाजन को बौद्ध धर्म का विरोध था। इस चातुरवर्णीय की शुरुआत ब्राह्मण धर्म ने ही की थी। फ्रांस के लिए फ्रांस की राज्यक्रांति का जितना महत्व है उतना ही महत्व मानव जाति के लिए बौद्ध धर्म के उदय का है।

वैदिक सीख के अनुसार आचरण बहुत आसान है। वैदिक लोग खास कर यज्ञ पूजक थे। बताया जाता है कि वैदिक आर्यों के तैंतीस करोड़ भगवान थे। अपने इन भगवानों को संतुष्ट करने के लिए वे यज्ञ किया करते थे। इन देवताओं की पूजा के लिए इकठ्ठा की जाने वाली सामग्री बहुत ही श्रेष्ठ स्तर की होना जरूरी था। कृषि युग के उन आर्यों को गो-धन ही सर्वश्रेष्ठ धन लगता था। इसीलिए वे अपने देवताओं की पूजा करते हुए गायों की बलि चढ़ाया करते थे। इसी कारण वैदिक धर्म हिंसा को बढ़ावा देने वाला माना जाने लगा था। यज्ञ में कई पशुओं की बलि दी जाती थी और जिन पशुओं को यज्ञ में बलि चढ़ाया जाता था उन्हें स्वर्ग प्राप्ति होती है ऐसी उनकी श्रद्धा थी। इसीलिए कहा जाता था कि - वैदिक हिंसा हिंसा न भवति - अर्थात्, वैदिक यज्ञों में हुई हिंसा, हिंसा नहीं होती।

यज्ञों में खुलेआम प्राणिहत्या का प्रचार हुआ करता था। इसलिए, बकरियां, भेड़ें, गायें जैसे जिन प्राणियों का मांस खाने योग्य माना जाता था उन सभी प्राणियों को यज्ञ

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांची भाषणेः संपादक . मा.फ. गाजरे, खंड-2 पुनर्मुद्रण 10-4-1986, पृष्ठ क्रमांक 174-179