268 6-6-1950 बौद्ध धर्म के कई तत्वों को हिंदु धर्म ने आत्मसात किया - कोलंबो - Page 196

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में बलि चढ़ाया जाता था। यज्ञों का प्रसार होने के कारण पुरोहितों का महत्व बढ़ा और ब्राह्मणवाद का जन्म हुआ। इस ब्राह्मणवाद ने समाज का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में विभाजन किया। चार वर्णों की स्थापना कर समाज में विषमता निर्माण करना ब्राह्मणवाद का मुख्य उद्देश्य था। क्योंकि उसके अलावा ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को स्थापित करना संभव नहीं था। अपनी श्रेष्टता की स्थापना के लिए ब्राह्मणों ने कुछ मंत्रों की रचना की। उन मंत्रों के सहारे वे कहने लगे कि ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रियों की उत्पत्ति बाहुओं से, वैश्यों की उत्पत्ति जंघा से और शूर्दों की उत्पत्ति ब्रह्मा के पैरों से हुई। इस प्रचार के अलावा वे कहने लगे कि ब्राह्मण सभी वर्णों के गुरु और सर्वश्रेष्ठ हैं। लेकिन भगवान बुद्ध ने उसका खंडन किया। उन्होंने कहा, जिस प्रकार अन्य सभी इंसान पैदा होते हैं उसी प्रकार ब्राह्मण भी पैदा होते हैं। ब्राह्मणों की स्त्रियां ऋतुमति होती हैं, गर्भवती होती हैं, नौ माहों तक गर्भ का पोषण करती हैं, प्रसूत होती हैं, बच्चे को दूध पिलाती हैं . ऐसा ही सर्वत्र दिखाई देता है। ऐसी स्थितियों में ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से निकले और शूद्र उसके पैरों से निकले ऐसा वे कह कैसे सकते हैं? जन्म से कोई भी शूद्र अथवा ब्राह्मण नहीं होता। अपनी करनी से आदमी ब्राह्मण या शूद्र बनता है।

इससे आगे डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने कहा,‘‘जटा, दाढ़ी, गोत्र अथवा जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं बनता। जो सत्य और धर्म के अनुसार आचरण करता है, जो काया, वाचा, मन से कोई पाप नहीं करता, जो काम-क्रोध रहित है, जो व्रती, शीलवान, अनुत्सुक, दान्त और जितेंद्रिय है_ जो तृष्णारहित और संशयरहित है_ जो क्रोध, द्वेष और मदरहित है_ जो शोकरहित, निर्मल और शुद्ध है_ जिसने भवपाश में फिर-फिर जन्म लेने के लिए कारण बनने वाले मोह का त्याग किया है, जिसने रती और अरती का त्याग किया है और जो शांतचित्त है, जो गंभीर, प्रज्ञावंत, मेधावी, सही और गलत मार्ग का ज्ञाता है_ जो सर्वोत्तम निर्वाण का अधिकारी है केवल उसे ही मैं ब्राह्मण कह सकता हूं।’’

जो धर्म मानव जाति के कल्याण के लिए सहायक हो सकता है, जिसके जरिए मानव की मुक्ति का द्वार खुल सकता है, जिसमें मानव-मानव के बीच भेदभाव नहीं- वरन् समानता है वही धर्म की संज्ञा के लिए पात्र है। जिस धर्म का मूल तत्व मानव-मानव में भेदभाव पैदा करना ही है वह धर्म ‘सद्धम्म’ कहलाने के लायक नहीं। ब्राह्मण धर्म ने मानव समाज में भेदभाव की खाइयां पैदा कीं। महिलाओं और शूद्रों के साथ अत्यंत घृणास्पद व्यवहार करने की सीख दी। भगवान बुद्ध के धर्म का मुख्य उद्देश्य मानवों की समता है। अपनी बुद्धि की कसौटी पर कसकर हर बात का स्वीकार करना अथवा उसे अस्वीकृत करने की आजादी इस धर्म में हर एक को है। हिंसा को हटाना और अहिंसा स्वीकार करना यह उसका प्रमुख अंग है। किसी भी प्राणी की देवता के नाम पर हत्या करने या उसे बलि चढ़ाने और फिर निर्लज्जता से ‘उसे स्वर्ग मिलने’ का प्रतिपादन करने का चलन बौद्ध धर्म में नहीं।