268 6-6-1950 बौद्ध धर्म के कई तत्वों को हिंदु धर्म ने आत्मसात किया - कोलंबो - Page 197

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भारत में बौद्ध धर्म का उदय और फ्रांस की राज्यक्रांति ये दो युगांतरकारी घटनाएं हैं ऐसा मुझे लगता है। बौद्ध धर्म के उदय से पहले किसी शूद्र के राजा बनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। लेकिन भारतीय इतिहासविद् यह जानते हैं कि बौद्ध धर्म के उदय के बाद शूद्रों को भी सिंहासन पर बैठने का मौका प्राप्त हो रहा है। इससे देश में सामाजिक समता की स्थिति निर्माण हुई। जनतांत्रिक राज्यपद्धति बौद्धकालीन देन है। भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद ईसापूर्व 274 तक बौद्ध की स्थिति क्या थी इसे जानने के पर्याप्त साधन आज उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि सम्राट अशोक के समय बौद्ध का बड़ी तेजी से विकास हुआ। अशोक और चंद्रगुप्त जैसे बलशाली सम्राट बौद्ध काल में ही हुए हैं। उन्होंने ही भारत से बाहर के राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए थे। बौद्ध युग में भारत में स्थापत्यकला, चित्रकला, मूर्तीकला आदि कई तरह की कलाओं का विकास हुआ। बौद्ध युग में साहित्य और दर्शन का इतना अधिक विकास हुआ कि कई देशों के छात्र यहां के नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों में शिक्षा के लिए आया करते थे। उससे पूर्व कभी भी भारत को इस प्रकार का गौरव प्राप्त नहीं हुआ था।

सवाल यह पैदा होता है कि जो धर्म इतना श्रेष्ट था, जिस धर्म का इतना प्रचार-प्रसार हुआ था वह भारत से लोप कैसे हो गया? इस सवाल के कई जवाब होंगे मुख्य रूप से सम्राट अशोक को इसके लिए जिम्मेदार मानता हूं। अशोक जरूरत से अधिक सहनशील था। इसीलिए मैं उसे दोषी मानता हूं। सम्राट अशोक ने अपने समय में बौद्ध धर्म के अलावा अन्य कई धर्मों को प्रचार की अनुमति दी जो बौद्ध के कट्टर दुश्मन थे। इससे बौद्ध के खिलाफ वाले धर्मों को अपनी शक्ति बढ़ाने का भरपूर मौका मिलता रहा। यही बौद्ध धर्म पर पहला आघात था ऐसा मुझे लगता है।

बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि भगवान बुद्ध के श्रमण शिष्यों में करीब 60 प्रतिशत ब्राह्मण थे। ब्राह्मण लोग बुद्ध से शास्त्रा करने के लिए आया करते थे। शास्त्रात में निरुत्तर होकर वे बुद्ध से प्रभावित होते थे और सहर्ष उनसे बौद्ध की दीक्षा लेकर बुद्ध के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते थे इन श्रमण शिष्यों के कारण भगवान बुद्ध का और उनके धर्म का प्रभाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा था। लेकिन बौद्ध धर्म में जातिभेद न होने के कारण जब निम्न जाति के लोग बुद्ध की शरण जाकर सिद्ध भिक्षु बनने लगे और धनिकों और राजाओं द्वारा उनकी पूजा और सम्मान जब होने लगा तब ब्राह्मणों से यह बात सही नहीं गई और वे बौद्ध को उखाड़ने के काम में लग गए।

भारत में प्राचीन समय से जिस प्रकार ग्राम-देवता, प्रदेश-देवता, वन-देवी, नदी-देवी, आदि देवी, देवता थे और उनकी पूजा हुआ करती थी उसी प्रकार कुलदेवता भी थी। राजा और धनिकों के कुलदेवताओं की पूजा बहुधा ब्राह्मण द्वारा ही हुआ करती थी। इसलिए राजमहल में कुलदेवता की पूजा के लिए जाने वाले ब्राह्मण रानी की मध्यस्थता