268 6-6-1950 बौद्ध धर्म के कई तत्वों को हिंदु धर्म ने आत्मसात किया - कोलंबो - Page 199

180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कोई नुकसान नहीं पहुंचा। उल्टे उनके द्वारा बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए द्रव्य सहायता किए जाने के सबूत भी मिलते हैं। गुप्तयुग में भारत पर हूणों के आक्रमण हुए लेकिन गुप्त राजाओं से पराजित होने के कारण वे भारत में ही रहे। उनके कारण भी बौद्ध धर्म का कोई नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, पेशावर के शक राजा कनिष्क ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। उसने तक्षशिला में विशाल बौद्ध विश्वविद्यालय खोला था और बौद्धों की चौथी धर्म-संगति यानी धर्मसभा बुलाई थी। इसी धर्मसंगति में महायान मार्ग का उदय हुआ और बौद्ध साहित्य संशोधित रूप में संस्कृत भाषा में लिखा जाने लगा। विदेशी आक्रमण् ाकारियों में से मुसलमानों के द्वारा बौद्ध धर्म का बेहद नुकसान हुआ। मुसलमान प्रतिमा और मूर्तियों के विरोधी थे। उन्होंने बौद्ध मूर्तियों को तहस-नहस किया और भिक्षुओं को मार डाला। नालंदा के विशाल विश्वविद्यालय को सैनिक किला समझकर उसपर हमला किया और चीवरदारी भिक्षुओं को सैनिक मानकर उनका संहार किया। जो भिक्षु उस भीषण रक्तपात से बचे वे नेपाल, तिब्बत, चीन आदि देशों में भाग गए।

नालंदा के विशाल ग्रंथालय में ताड़पत्र और भोजपत्रों पर लिखे दो लाख ग्रंथ थे। हजारों वर्षों का ज्ञान उसमें सम्मिलित था। बख्तियार खिलजी ने उनमें आग लगा दी और वहां पढ़ रहे छह हजार छात्रों में से कुछ छात्रों की हत्या की और कुछ को जबरदस्ती मुसलमान बनाया। बौद्ध मूर्तियों की तोड़-फोड़ की। मुसलमान आक्रमणकारी जहां-जहां भी गए वहां-वहां उन्होंने बौद्धों को या तो मार गिराया या फिर मुसलमान बनाया और बौद्ध मूर्तियों की तोड़-फोड़ की। ग्रंथालय जलाए और विहार नष्ट किए। मेरे कुछ हिंदू मित्र मुझसे पूछते हैं कि मुसलमान आक्रमणकारियों ने हिंदू मंदिर और हिंदुओं की मूर्तियों को भी तहस-नहस कर दिया है ना? इस पर मेरा जवाब यह है कि उन्होंने बौद्ध धर्म का जितना नुकसान किया उतना हिंदू धर्म का नहीं किया। इसकी वजह यह है कि लगभग सभी ब्राह्मण गृहस्थ थे और वे अपने परिवार के साथ अपने ही घरों में रहते थे इसलिए उनकी अलग पहचान नहीं थी। परंतु, बौद्ध भिक्षु मात्र परिवार से अलग, चीवरधारी थे और विहारों में रहते थे। उन्हें पहचानना आसान था। इसलिए, हिंदुओं के प्रसिद्ध मंदिरों के साथ भले मुसलमानों द्वारा तोड़-फोड़ की गई हो लेकिन उनके धर्मगुरुओं और पुरोहितों को कोई हानि नहीं पहुंची थी।

किसी भी धर्म के जिंदा रहने के लिए उसके धर्मगुरुओं और पुरोहितों का लगातार बने रहना आवश्यक होता है। बौद्ध धर्म लोप होने का एक विशेष कारण था बौद्ध भिक्षुओं का अभाव होना। बौद्ध भिक्षुओं की कोई भी जाति नहीं थी। कोई भी व्यक्ति बौद्ध धर्म की शरण में जाकर उपासक, श्रामनेर, भिक्षु अथवा स्थविर-महास्थविर बन सकता था। भिक्षु लोग समाज से दूर विहारों में रहते थे। ब्राह्मणवाद में ऐसी बात नहीं थी। वहां केवल ब्राह्मणों के घर पैदा होने से ही नया ब्राह्मण निर्माण होता था। इस कारण