184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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बौद्ध धर्म के अलावा अछूतों के उद्धार का और कोई रास्ता नहीं
दिनांक 10 जून, 1950 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का एक और भाषण कोलंबो के टाऊन हॉल में हुआ। टाऊन हॉल का समारोह पूरे सिलोन शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की ओर से आयोजित किया गया था। सिलोन के अस्पृश्य का बड़ा समुदाय समारोह में उपस्थित था। इस अवसर पर डॉ. बाबासाहेब का सम्मान किया गया। जवाब में अपने जातिबंधुओं को संबोधित करते हुए कहा-
‘‘सिलोन बौद्धधर्मियों का देश है। बौद्ध धर्म स्वीकार करने में ही अस्पृश्यों की मुक्ति का मार्ग है। इस बात का मुझे पूरा यकीन है, इसलिए मुझे लगता है कि आप एक तरह से सौभाग्यशाली देश में हैं। सिलोन की बौद्धधर्मीय जनता से मैं कहना चाहता हूं कि अस्पृश्य वर्गीय बंधुओं को आप मन से जोड़ कर बौद्ध धर्म में शामिल कर लें और अपनाए हुए बच्चे की तरह उनके हितों की रक्षा करें।’’
‘‘केवल सिलोन के बारे में बोलना हो तो, मैं कहूंगा कि सिलोन बौद्धधर्मीय देश होने के कारण यहां ‘अस्पृश्यों का संगठन’ बना कर आपको यहां अलग से संगठित होने की जरूरत नहीं है। भारत में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन है इसलिए आपको उनका अनुकरण करने की जरुरत नहीं। बौद्धधर्मीय देश में खुद को अस्पृश्य समझने की जरूरत नहीं। क्या आप खुद को अस्पृश्य समझें? क्या आपकी यही पहचान हो? - इस बारे में सोचने जैसे हालात अब पैदा हुए हैं। हमें राजनीतिक अधिकार मिलें, विधिमंडल में हमें जगह मिले और समाज हमारे साथ समानता का व्यवहार करे इसलिए भारत में हम एक लम्बी राजनीतिक लडाई लड़ रहे हैं। हमें अभी सफलता नहीं मिली है। इसका मतलब यही है कि राजनीतिक संग्राम से हमें अभी मुक्ति नहीं मिली है।
पिछले 35 सालों से मेरी ये राजनीतिक लड़ाई चल रही है। इस लड़ाई में मुझे उच्चवर्णीय हिंदुओं से लोहा लेना पड़ रहा है। इसी दौरान मैंने दुनिया के सभी धर्मों के बारे में पढ़ाई की और अब, आखिर मैं एक अपिहार्य निर्णय तक आ पहुंचा हूं। निर्णय यही है कि बौद्ध धर्म के अलावा अस्पृश्यों के लिए मुक्ति की कोई और राह नहीं है। केवल बौद्ध धर्म में ही अस्पृश्यता निवारण का चिरकालीन उपाय है। आप अगर समानता
जनताः 10 जून, 1950