186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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संविधान की नीति का कड़ाई से पालन करें
बौद्ध धर्मियों की मशहूर परिषद में हिस्सा लेने के बाद कोलंबो से लौटते हुए भारत के कानून मंत्री डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का दिनांक 10 जून, 1950 को त्रिवेंद्रम के लेजिस्लेटिव चेंबर में भाषण हुआ। चेंबर के बड़े हॉल में सरकारी अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और अस्पृश्य बांधवों-भगिनियों की भीड़ थी । संविधान और संविधानात्मक नीति इस विषय पर बाबासाहेब का विचारप्रवर्तक और समयोचित में कहा-
प्रत्यक्ष संविधान से अधिक संविधान के अनुसार व्यवहार करने की नीति जनता में होना बेहद महत्वपूर्ण है। देश में पार्लिमेंटरी पद्धति को सफलता मिले, इसलिए सरकार और जनता द्वारा संविधान के कुछ संकेत और नीतियों का पालन करना आवश्यक है। ये संकेत और नीतियां निम्नलिखित हैं -
सरकार बनाने की पद्धति के बारे में आदर, कानून का पालन, अलग से खुद सोचने की आदत और बहुसंख्यकों के लिए बने नियमों का पालन।
इसी प्रकार सरकार को भी निम्नलिखित नीतियों का पालन करना होगा -
देश की बहुसंख्य जनता का अपने पर से विश्वास डिग जाने की बात ध्यान में आने के बाद संविधान की नीति का अनुसरण करते हुए सरकार को अपने अधिकार का त्याग करना चाहिए। अल्पसंख्यकों के बारे में आदर की भावना रखनी चाहिए और अंतिम बात यह कि, राज्य का प्रशासन निष्पक्ष हो।
अपने समाज के लोगों का रहन-सहन, उनकी सोचने की क्षमता आदि बातों को ध्यान में रखते हुए केवल सैद्धांतिक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित कर संविधान बनाने के कारण विश्व के कई संविधान असफल रहे हैं। अधिकार प्राप्त लोगों को एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि संविधान बनाने और राज्य चलाने का जो अधिकार उन्हें प्राप्त है वह कुछ शर्तों के साथ लोगों द्वारा ही उन्हें दिया जाता है। सरकार अच्छा काम करेगी यह सोचकर ही ये अधिकार दिए जाते हैं। वे अगर इस शर्त को पूरा नहीं कर सकते तो सरकार को अपने अधिकारसूत्र छोड़ देने चाहिए।
जनताः 17 जून, 1950